आपकी उदासी का कारण | aapki udaasi kakara| hindi kahaniya | moral stories | Motivational Story
आपकी उदासी का कारण | aapki udaasi kakara| hindi kahaniya | moral stories | Motivational Story
स्वागत है | आज की इस कहानी का नाम है - आपकी उदासी का कारण | अगर आपको hindi kahaniya, moral stories, hindi stories, Motivational Story पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़े|
मौत से पहले मर चुका हूँ। इस जिंदगी से थक चुका हूँ। कोई ऐसा तरीका बता दें है ज़िंदगी? की याद आ जाये बचपन वाली मस्ती। जो मैं भूल चुका हूँ। मुझे जीवन में खामियां भी नहीं मिली, क्या इसीलिए मैं खुद से नाराज हूँ? या फिर मैं पैसा नहीं कमा पाया या फिर मुझे अपना प्यार नहीं मिला?
यह सारी चीजे मुझे उदास बना रही है। या मैं खुद ही अपनी उदासी का कारण हो? अक्सर इंसान अपनी उदासी के लिए। हमेशा दूसरी चीजों को दोष देता रहता है। लेकिन ज़रा सोचिए कि मैंने क्या खोया, क्या पाया यह सब एक तरफ और मेरी उदासी एक तरफ? कई इन दोनों बातों में संबंध है। क्या मेरी उदासी का कारण मुझे समझ में आता है? शायद मेरे कहने से आपको यह बात समझ में न आएं, लेकिन आज की जो बोध कहानी में आपको सुनाने जा रहा हूँ, उसे सुनने के बाद। आपको खुद में खुद पता चल जाएगा कि आपकी उदासी का कारण आप स्वयं है, ना की कोई वस्तु, कोई लक्ष्य है या कोई हार या कुछ खोना।
ये सारी चीजें जीवन का एक हिस्सा होती है। इसके बिना जीवन अधूरा होता है, लेकिन हम अपनी अज्ञानता वश अक्सर अपनी उदासी का कारण इन्हीं चीजों को मान लेते हैं और हमेशा उदास रहने लगते हैं। इस बोध कहानी में आपको ऐसे वैज्ञानिक तरीके पता चलेंगे। जो आपकी उदासी को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे। और उसके बाद बचपन की वो मस्ती जिसे हम भूल चूके हैं, वो फिर से हमारे जीवन में लौट आएगी। फिर से खुले आसमान में उड़ते हुए पक्षियों की कतार आपके दिल में आनंद पैदा कर जाएगी। इससे पहले कि आप इस कहानी में खो जाए, इस चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर लें। तो चलिए कहानी शुरू करते हैं। बचपन में ही अगर किसी बच्चे को उदासी पकड़ ले, वो परेशान रहे, निराश रहे तो यह बड़ा ही चिंता का विषय रहता है।
क्योंकि बचपन में तो बच्चे के सर पर कोई भी जिम्मेदारी नहीं होती, वो आजाद होता है। खेलने के लिए मस्ती करने के लिए इसीलिए हम कहते हैं कि बचपन के दिन सबसे अच्छे दिन होते हैं, सबसे प्यारे दिन होते हैं और हम अपने बचपन के दिनों को कभी नहीं भुला पाते। ऐसा ही एक हरीश नाम का बच्चा था। बात उस समय की है जब शिक्षाएं गुरुकुल में दी जाती थी।
आज दुनिया जितनी आधुनिक है, उस समय उतनी ही आध्यात्मिक हुआ करती थी। ज्ञान के तरीके भी वही हुआ करते थे जो जीवन को एक नया रूप दे, जीवन में एक नई मस्ती पैदा करे। लेकिन 10 वर्ष की आयु में जहाँ आम बच्चे बहुत ही आनंद और मस्ती से रहते थे वहीं ये बच्चा बहुत ही निराश और उदास रहता था। अक्सर वो अकेला ही बैठा रहता था। सबको लगता था की ये अकेले पन का शिकार है। किसी मजाक पर उसे कोई हसीना आती थी। जब उस बच्चे के माता पिता अपने बच्चे की ये हालत देखते तो उन्हें अंदर ही अंदर बहुत दुख होता। उनकी आत्मा रोने लगती की हमारा बच्चा अभी से इतना दुखी रहता है तो?
तू आगे चलकर तो ये जी भी नहीं पाएगा। इसका जीना मुश्किल हो जाएगा। कैसे अपनी ज़िन्दगी को पूरी तरह से जियेगा? इसीलिए जब बहुत समझाने पर भी उन्हें अपने बेटे पर कोई असर नजर नहीं आया तो उन्होंने निश्चय किया कि वो अपने बच्चे को गुरुकुल में भेज देंगे। अपने इकलौते बच्चे को अपने से दूर भेजना किसी भी माँ बाप के लिए बहुत दुख का कारण होता है। उनके मन को भी बहुत पीड़ा पहुंची। लेकिन उसके सुनहरे भविष्य के लिए उसकी उदासी को दूर करने के लिए उन्हें यह कदम उठाना पड़ा और 1 दिन दोनों माता पिता अपने बच्चे को लेकर एक गुरुकुल में पहुँच जाते हैं। जब वो वहाँ पहुंचे तो दोपहर का समय था। सभी बच्चे अपना अपना काम करने में लगे हुए थे। कोई गायों को चारा डाल रहा था तो कोई दूसरे बच्चों के लिए भोजन तैयार कर रहा था।
सभी बच्चे गुरुकुल के काम मिल जुलकर कर रहे थे और उनका गुरु उन्हें निर्देश दे रहा था कि किस प्रकार और किस काम को पहले करना है। गुरुकुल की शिक्षाएं अक्सर ऐसे ही वह करती थी। गुरुकुल में बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने की कला सिखाई जाती थी। इसीलिए गुरुकुल के ज्यादातर काम बच्चे आपस में ही बांटकर किया करते थे और यही व्यवस्था उनके जीवन की सीख बन जाती थी। बाकी समय में उनके गुरु उन्हें ध्यान की शिक्षाएं दिया करते थे। जीवन के अंधकार को मिटाकर रौशनी की तरफ कैसे बढ़ा जाए, यही उस गुरुकुल में सिखाया जाता था और ये शिक्षाएं केवल उपदेश के माध्यम से नहीं होती थी बल्कि इनके लिए वैज्ञानिक पद्धतियां बनी हुई थी। जिसका अभ्यास करते हुए गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चे उन शिक्षकों को अनुभव भी कर पाते थे। जब हरीश अपने माता पिता के साथ उस गुरुकुल का दृश्य देख रहा था तो उसके अंदर कोई भी जोश या कोई भी उत्साह देखने को नहीं मिला। वो एकदम शांत खड़ा था, एकदम उदास। उदासी वाली शांति उसके चेहरे पर छाई हुई थी। उसके अंदर कोई जिज्ञासा नहीं थी कि वो उस गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करें।
और दूसरी तरफ उसके माता पिता ने जब बच्चों को अनेक अनेक काम करते हुए देखा तो उन्हें भी लगा कि यहाँ पर तो बच्चों से काम करवाया जाता है। शिक्षा एक हाँ दी जाती है। अगर हम अपने बच्चे को गुरुकुल में डाल दें तो ये गुरु तो इससे पूरे आश्रम का काम करवायेगा। उसकी उदासी कैसे दूर होगी, उसे शिक्षा कैसे मिले गी, उस का भविष्य कैसे सुधरेगा? ऐसे ही अनेक अनेक प्रकार के सवाल उनके मन में उठ रहे थे। आखिर में जब गुरु उनसे मिलने के लिए पहुंचा तो हरीश के माता पिता ने उनसे पूछा की ये गुरुदेव ये बच्चे तो अभी इतने छोटे हैं और आप इनसे आश्रम का काम करवा रहे हैं?
आपको इन्हें शिक्षाएं देनी चाहिए। इनको पढ़ाना चाहिए लेकिन आप तो इन्हें दूसरे कामों में लगा दे रहे हैं, इससे इन्हें शिक्षा ये कैसे मिलेंगी? ये सुनकर उस गुरु ने मुस्कुराते हुए कहा कि यही तो इंसान गलती करता है, वो केवल पढ़ना चाहता है, वो केवल शिक्षाएं ग्रहण करना चाहता है। वो केवल किताबी ज्ञान चाहता है लेकिन उस किताबी ज्ञान को संसार में कैसे उपयोग करना है ये
उन्हें कोई नहीं बताता। इसी वजह से संसार में अधिकतर लोग धन तो कमा लेते हैं लेकिन जीवन जीने की कला नहीं सीख पाते। जीवन जीने का तरीका उन्हें सिखाया ही नहीं गया तो भला उन्हें कैसे पता होगा कि जो धन उन्होंने कमाया है, उससे अपने जीवन को बेहतर कैसे बनाया जाए? इसके बाद गुरु ने कहा की यहाँ जो शिक्षाएं मैं अपने बच्चों को देता हूँ। वो शिक्षाएं केवल काम के प्रति नहीं होती है। मैं सिर्फ उनसे काम नहीं करवाता बल्कि मैंने उनके लिए अलग अलग चरण बना रखे है। प्रथम चरण में मैं उन्हें किताबी ज्ञान देता हूँ और उसके बाद उसी ज्ञान का उसकी दैनिक दिनचर्या में उपयोग भी कर आता हूँ ताकि वो ज्ञान सिर्फ किताबी ज्ञान न रह जाए बल्कि वो अनुभव के तौर पर उसके अंदर उतर जाए
यही मेरा शिक्षा देने का तरीका है और इसी तरह मैं अपने बच्चों को अपना ज्ञान बेहतर तरीके से दे पाता हूँ। जब उस गुरु ने हरीश के चेहरे की तरफ देखा तो उन्होंने पाया कि वो अपने ख्यालों में डूबा हुआ है और उसका ध्यान उनकी बातचीत पर बिलकुल भी नहीं था। ये देखकर गुरु तुरंत ही समझ गए कि ये बच्चा अपनी ही दुनिया में खोया रहता है। उसकी समस्या समझते हुए। गुरु ने उसके माता पिता से कहा कि आपका बेटा अपनी ही दुनिया में खोया रहता है, अक्सर ये उदास रहता होगा। दुनिया से कटा कटा रहता होगा, दूसरे बच्चों से इसकी दोस्ती नहीं होगी। ये अकेले पन में ही रहना पसंद करता होगा। ये जो भी बातें गुरु ने बताई थी, ये एकदम सत्य थी। इसीलिए हरीश के माता पिता को लगा कि अगर इन्हें हमारे बेटे की समस्या पता है।
तो हो सकता है वो हमारे बेटे का जीवन भी बदल दें और इसी वजह से वो अपने बेटे को गुरुकुल में रखने के लिए तैयार हो जाते हैं। लेकिन जाने से पहले वो उस गुरु से एक सवाल पूछते हैं। वो कहते हैं कि हे गुरुवर जो आप इन्हें किताबी ज्ञान देते हैं, जो शिक्षाएं देते है वो क्या होती है? वो किस विषय पर निर्भर होती है, आप ये बताने की कृपा करेंगे। मुस्कुराते हुए इसका जवाब देते हुए गुरु ने कहा। की मैं अपनी अधिकतर शिक्षाएं इंसानी मन और इंसानी मस्तिष्क से ही संबंधित रखता हूँ, क्योंकि सभी समस्याएं और सभी समाधान इन्हीं से उत्पन्न होते हैं।
इसीलिए अगर बाहर की दुनिया को सुधारना है तो सबसे पहले हमें हमारी भीतर की दुनिया को बदलना होगा। सबसे पहला चरण जो मैं अपने बच्चों को सीखाता हूँ वो होता है कि अपनी ख्याल ई दुनिया से कैसे बाहर आया जाए। अक्सर लोग अपनी ख्याल ई दुनिया में ही जीते रहते हैं। उनके विचार नाना प्रकार के विषयों में भटकते रहते हैं। इसीलिए सबसे पहले उनके मन को खयालों से खींचकर वर्तमान में लेकर आना है, यहाँ पर उपस्थित करना है और एक बार जब आपका मन उपस्थित होना सीख जाता है तो उसको कुछ भी सीखाना कठिन नहीं रह जाता। अब आप इस मन में कोई भी चीज़, कोई भी बात, कोई भी ज्ञान बड़ी आसानी से डाल सकते हैं। इसके लिए मैं अपने सभी बच्चों को जो पुराने हैं उन्हें भी और जो नए आते हैं उन्हें भी।
हर बार एक ही उपदेश देता हूँ उपदेश मैं आपको बताता हूँ। इसके बाद गुरु ने कहना शुरू किया कि अक्सर इंसान का ख्यालों में जाने का एक ही कारण होता है और एक ही कारण उसकी उदासी का होता है, उसकी निराशा का होता है। वो कारण क्या है? मैं यह नहीं कहूंगा कि इसका कारण आपके विचार है या आपका मन है, वो तो आपके काबू में है ही नहीं, उस पर तो आपका कोई मशीन नहीं है। क्या आप अपने आने वाले विचारों को रोक सकते हैं? क्या आप उन्हें बदल सकते हैं? आप उसे हरगिज नहीं बदल सकते। आप कितनी भी कोशिश कर लें, आप ऊपर से कितनी भी कोशिश कर लें लेकिन आप अपने मन को नहीं बदल पाएंगे। जब तक की
आप अपने मन को बदलने का विज्ञान नहीं सीख लेते, जब भी कोई बच्चा या कोई बड़ा कोई खेल खेलता है, अपना पसीना बहाता है, तो उसके सारे ख्याल मिट जाते हैं। सारे विचार शून्य हो जाते हैं और उसके अंदर एक आनंद की लहर दौड़ जाती है। भले ही वो बच्चा कितना भी उदास क्यों ना रहता हो। कितना ही निराश क्यों ना रहता हो, कितना ही अकेले पन में क्यों ना रहता हो।
लेकिन जब उसके शरीर से पसीना निकलता है मतलब जब वो मेहनत करता है तो उसका अकेलापन उसकी उदासी कुछ पलों के लिए तो दूर हो ही जाती है, ये तो हम सभी महसूस कर पाते हैं लेकिन ऐसा होता कैसे है? इसके पीछे विज्ञान क्या है? जब भी कोई आदमी मेहनत करता है, पसीना बहाता है तो उसकी सांसें तेज तेज चलने लगती है। मतलब उसकी सांसें जल्दी जल्दी बाहर और अंदर आने जाने लगती है। जब सांस अंदर जाती है तो हम कहते हैं कि ऑक्सीजन अंदर जा रही है और जब सांस पहाड़ आती है तो हम कहेंगे की कार्बन डाइऑक्साइड बाहर आती हैं।
अब जब मेहनत करने वाले इंसान की सांसे तेजी से चलने लगती है तो साधारण रूप से ज्यादा ऑक्सीजन उसके अंदर जाती है और ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड बाहर आती है। इसीलिए जब हमारे खून में ऑक्सीजन की मात्रा या कहें कि शुद्ध हवा का स्तर हमारे खून में बढ़ने लगता है तो हमारे खून में बढ़ने लगता है तो हमें आनंद की प्राप्ति होती है। हम खयालों से लौटकर वर्तमान में वापस आने लगते हैं। इसके साथ दूसरी प्रक्रिया भी हो रही है। मतलब गंदी हवा या कहें कि कार्बन डाइऑक्साइड हमारे खून से बाहर जा रही है और शुद्ध हवा।
हमारे अंदर जा रही है और जितनी ज्यादा मात्रा में शुद्ध हवा हमारे फेफड़ों में भरेगी, हमारे खून में भरेगी, उतने ही आनंद को हमारा मस्तिष्क महसूस कर पाएगा। इसलिए सबसे पहले और सबसे जरूरी सीडी होती है की अपने खून के अंदर अपने भेड़ों के अंदर शुद्ध हवा ज्यादा से ज्यादा भरनी और गंदी हवा ज्यादा से ज्यादा बाहर निकालने और इसके लिए मैं अपने शिष्यों को कोई खेल नहीं खिलाता, उन्हें भगाता, दौड़ाता नहीं हूँ। उन्हें बैठाकर प्रतिदिन रोज़ सुबह 2 घंटे उस प्रकार के योग अभ्यास कराता हूँ जो सांसों से जुड़े होते हैं।
इसीलिए जब कोई भी इंसान नित्य रूप से अपने शरीर के अंदर ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाने का प्रयास करता रहता है, ये प्रयास योग अभ्यास से भी हो सकते हैं या फिर ये किसी खेल के माध्यम से भी हो सकते हैं या नाच गाने से भी हो सकते हैं तो वो इंसान आनंद की तरफ अपना पहला कदम बढ़ाता है और यही कदम उसकी ध्यान की सबसे पहली सीढ़ी बनता है। यह उपदेश खत्म करने के बाद। गुरु ने हरीश के माता पिता से कहा की आप हरीश को तीन महीने के लिए मेरे पास यही गुरुकुल में छोड़ दें और तीन महीने बाद आप खुद अपने बेटे में बदलाव महसूस कर पाएंगे। ये सुनकर हरीश के माता पिता उस गुरु को प्रणाम करके और हरीश को उनके पास छोड़कर वापस चले जाते हैं। जब वो तीन महीने बाद वापस वहाँ पर आते हैं तो उनकी आंखें खुली की खुली रह जाती है।
वो हरीश जो हमेशा उदासी में रहता था, हमेशा अकेले पन में रहता था, कभी कोई काम नहीं करता था, आज वह एक गाय को नहलाने में लगा हुआ था और वो भी अपने मित्रों के साथ। हँस हंसकर बातें भी कर रहा था। यह दृश्य देखकर हरीश के माता पिता के मन में बहुत संतोष पहुंचा। उन्हें बहुत खुशी मिली और उन्होंने गुरु को प्रणाम करते हुए कहा कि हे गुरुदेव ये वैज्ञानिक प्रणाली जो आपने बताई है, ये समस्त मानव जाति का जीवन परिवर्तित कर सकती है। ये विधि केवल बच्चों के लिए नहीं है अपितु समस्त मानव जाति के लिए है। इन तीन महीनों में हमने भी आपके बताए अनुसार इन विधियों का पालन किया और हमारे अंदर भी हमने एक अभूतपूर्व बदलाव महसूस किया। हम धन्य हो गए आपसे ये ज्ञान लेकर। इसके बाद उन्होंने गुरु को प्रणाम किया।
और अपने बेटे को लेकर अपने घर की तरफ रवाना हो गए और पीछे से गुरु अपने शिष्य को जाते हुए देखता रहा तो दोस्तों कैसी लगी ये कहानी आपको कमेंट सेक्शन में जरूर बताना
मौत से पहले मर चुका हूँ। इस जिंदगी से थक चुका हूँ। कोई ऐसा तरीका बता दें है ज़िंदगी? की याद आ जाये बचपन वाली मस्ती। जो मैं भूल चुका हूँ। मुझे जीवन में खामियां भी नहीं मिली, क्या इसीलिए मैं खुद से नाराज हूँ? या फिर मैं पैसा नहीं कमा पाया या फिर मुझे अपना प्यार नहीं मिला?
यह सारी चीजे मुझे उदास बना रही है। या मैं खुद ही अपनी उदासी का कारण हो? अक्सर इंसान अपनी उदासी के लिए। हमेशा दूसरी चीजों को दोष देता रहता है। लेकिन ज़रा सोचिए कि मैंने क्या खोया, क्या पाया यह सब एक तरफ और मेरी उदासी एक तरफ? कई इन दोनों बातों में संबंध है। क्या मेरी उदासी का कारण मुझे समझ में आता है? शायद मेरे कहने से आपको यह बात समझ में न आएं, लेकिन आज की जो बोध कहानी में आपको सुनाने जा रहा हूँ, उसे सुनने के बाद। आपको खुद में खुद पता चल जाएगा कि आपकी उदासी का कारण आप स्वयं है, ना की कोई वस्तु, कोई लक्ष्य है या कोई हार या कुछ खोना।
ये सारी चीजें जीवन का एक हिस्सा होती है। इसके बिना जीवन अधूरा होता है, लेकिन हम अपनी अज्ञानता वश अक्सर अपनी उदासी का कारण इन्हीं चीजों को मान लेते हैं और हमेशा उदास रहने लगते हैं। इस बोध कहानी में आपको ऐसे वैज्ञानिक तरीके पता चलेंगे। जो आपकी उदासी को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे। और उसके बाद बचपन की वो मस्ती जिसे हम भूल चूके हैं, वो फिर से हमारे जीवन में लौट आएगी। फिर से खुले आसमान में उड़ते हुए पक्षियों की कतार आपके दिल में आनंद पैदा कर जाएगी। इससे पहले कि आप इस कहानी में खो जाए, इस चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर लें। तो चलिए कहानी शुरू करते हैं। बचपन में ही अगर किसी बच्चे को उदासी पकड़ ले, वो परेशान रहे, निराश रहे तो यह बड़ा ही चिंता का विषय रहता है।
क्योंकि बचपन में तो बच्चे के सर पर कोई भी जिम्मेदारी नहीं होती, वो आजाद होता है। खेलने के लिए मस्ती करने के लिए इसीलिए हम कहते हैं कि बचपन के दिन सबसे अच्छे दिन होते हैं, सबसे प्यारे दिन होते हैं और हम अपने बचपन के दिनों को कभी नहीं भुला पाते। ऐसा ही एक हरीश नाम का बच्चा था। बात उस समय की है जब शिक्षाएं गुरुकुल में दी जाती थी।
आज दुनिया जितनी आधुनिक है, उस समय उतनी ही आध्यात्मिक हुआ करती थी। ज्ञान के तरीके भी वही हुआ करते थे जो जीवन को एक नया रूप दे, जीवन में एक नई मस्ती पैदा करे। लेकिन 10 वर्ष की आयु में जहाँ आम बच्चे बहुत ही आनंद और मस्ती से रहते थे वहीं ये बच्चा बहुत ही निराश और उदास रहता था। अक्सर वो अकेला ही बैठा रहता था। सबको लगता था की ये अकेले पन का शिकार है। किसी मजाक पर उसे कोई हसीना आती थी। जब उस बच्चे के माता पिता अपने बच्चे की ये हालत देखते तो उन्हें अंदर ही अंदर बहुत दुख होता। उनकी आत्मा रोने लगती की हमारा बच्चा अभी से इतना दुखी रहता है तो?
तू आगे चलकर तो ये जी भी नहीं पाएगा। इसका जीना मुश्किल हो जाएगा। कैसे अपनी ज़िन्दगी को पूरी तरह से जियेगा? इसीलिए जब बहुत समझाने पर भी उन्हें अपने बेटे पर कोई असर नजर नहीं आया तो उन्होंने निश्चय किया कि वो अपने बच्चे को गुरुकुल में भेज देंगे। अपने इकलौते बच्चे को अपने से दूर भेजना किसी भी माँ बाप के लिए बहुत दुख का कारण होता है। उनके मन को भी बहुत पीड़ा पहुंची। लेकिन उसके सुनहरे भविष्य के लिए उसकी उदासी को दूर करने के लिए उन्हें यह कदम उठाना पड़ा और 1 दिन दोनों माता पिता अपने बच्चे को लेकर एक गुरुकुल में पहुँच जाते हैं। जब वो वहाँ पहुंचे तो दोपहर का समय था। सभी बच्चे अपना अपना काम करने में लगे हुए थे। कोई गायों को चारा डाल रहा था तो कोई दूसरे बच्चों के लिए भोजन तैयार कर रहा था।
सभी बच्चे गुरुकुल के काम मिल जुलकर कर रहे थे और उनका गुरु उन्हें निर्देश दे रहा था कि किस प्रकार और किस काम को पहले करना है। गुरुकुल की शिक्षाएं अक्सर ऐसे ही वह करती थी। गुरुकुल में बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने की कला सिखाई जाती थी। इसीलिए गुरुकुल के ज्यादातर काम बच्चे आपस में ही बांटकर किया करते थे और यही व्यवस्था उनके जीवन की सीख बन जाती थी। बाकी समय में उनके गुरु उन्हें ध्यान की शिक्षाएं दिया करते थे। जीवन के अंधकार को मिटाकर रौशनी की तरफ कैसे बढ़ा जाए, यही उस गुरुकुल में सिखाया जाता था और ये शिक्षाएं केवल उपदेश के माध्यम से नहीं होती थी बल्कि इनके लिए वैज्ञानिक पद्धतियां बनी हुई थी। जिसका अभ्यास करते हुए गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चे उन शिक्षकों को अनुभव भी कर पाते थे। जब हरीश अपने माता पिता के साथ उस गुरुकुल का दृश्य देख रहा था तो उसके अंदर कोई भी जोश या कोई भी उत्साह देखने को नहीं मिला। वो एकदम शांत खड़ा था, एकदम उदास। उदासी वाली शांति उसके चेहरे पर छाई हुई थी। उसके अंदर कोई जिज्ञासा नहीं थी कि वो उस गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करें।
और दूसरी तरफ उसके माता पिता ने जब बच्चों को अनेक अनेक काम करते हुए देखा तो उन्हें भी लगा कि यहाँ पर तो बच्चों से काम करवाया जाता है। शिक्षा एक हाँ दी जाती है। अगर हम अपने बच्चे को गुरुकुल में डाल दें तो ये गुरु तो इससे पूरे आश्रम का काम करवायेगा। उसकी उदासी कैसे दूर होगी, उसे शिक्षा कैसे मिले गी, उस का भविष्य कैसे सुधरेगा? ऐसे ही अनेक अनेक प्रकार के सवाल उनके मन में उठ रहे थे। आखिर में जब गुरु उनसे मिलने के लिए पहुंचा तो हरीश के माता पिता ने उनसे पूछा की ये गुरुदेव ये बच्चे तो अभी इतने छोटे हैं और आप इनसे आश्रम का काम करवा रहे हैं?
आपको इन्हें शिक्षाएं देनी चाहिए। इनको पढ़ाना चाहिए लेकिन आप तो इन्हें दूसरे कामों में लगा दे रहे हैं, इससे इन्हें शिक्षा ये कैसे मिलेंगी? ये सुनकर उस गुरु ने मुस्कुराते हुए कहा कि यही तो इंसान गलती करता है, वो केवल पढ़ना चाहता है, वो केवल शिक्षाएं ग्रहण करना चाहता है। वो केवल किताबी ज्ञान चाहता है लेकिन उस किताबी ज्ञान को संसार में कैसे उपयोग करना है ये
उन्हें कोई नहीं बताता। इसी वजह से संसार में अधिकतर लोग धन तो कमा लेते हैं लेकिन जीवन जीने की कला नहीं सीख पाते। जीवन जीने का तरीका उन्हें सिखाया ही नहीं गया तो भला उन्हें कैसे पता होगा कि जो धन उन्होंने कमाया है, उससे अपने जीवन को बेहतर कैसे बनाया जाए? इसके बाद गुरु ने कहा की यहाँ जो शिक्षाएं मैं अपने बच्चों को देता हूँ। वो शिक्षाएं केवल काम के प्रति नहीं होती है। मैं सिर्फ उनसे काम नहीं करवाता बल्कि मैंने उनके लिए अलग अलग चरण बना रखे है। प्रथम चरण में मैं उन्हें किताबी ज्ञान देता हूँ और उसके बाद उसी ज्ञान का उसकी दैनिक दिनचर्या में उपयोग भी कर आता हूँ ताकि वो ज्ञान सिर्फ किताबी ज्ञान न रह जाए बल्कि वो अनुभव के तौर पर उसके अंदर उतर जाए
यही मेरा शिक्षा देने का तरीका है और इसी तरह मैं अपने बच्चों को अपना ज्ञान बेहतर तरीके से दे पाता हूँ। जब उस गुरु ने हरीश के चेहरे की तरफ देखा तो उन्होंने पाया कि वो अपने ख्यालों में डूबा हुआ है और उसका ध्यान उनकी बातचीत पर बिलकुल भी नहीं था। ये देखकर गुरु तुरंत ही समझ गए कि ये बच्चा अपनी ही दुनिया में खोया रहता है। उसकी समस्या समझते हुए। गुरु ने उसके माता पिता से कहा कि आपका बेटा अपनी ही दुनिया में खोया रहता है, अक्सर ये उदास रहता होगा। दुनिया से कटा कटा रहता होगा, दूसरे बच्चों से इसकी दोस्ती नहीं होगी। ये अकेले पन में ही रहना पसंद करता होगा। ये जो भी बातें गुरु ने बताई थी, ये एकदम सत्य थी। इसीलिए हरीश के माता पिता को लगा कि अगर इन्हें हमारे बेटे की समस्या पता है।
तो हो सकता है वो हमारे बेटे का जीवन भी बदल दें और इसी वजह से वो अपने बेटे को गुरुकुल में रखने के लिए तैयार हो जाते हैं। लेकिन जाने से पहले वो उस गुरु से एक सवाल पूछते हैं। वो कहते हैं कि हे गुरुवर जो आप इन्हें किताबी ज्ञान देते हैं, जो शिक्षाएं देते है वो क्या होती है? वो किस विषय पर निर्भर होती है, आप ये बताने की कृपा करेंगे। मुस्कुराते हुए इसका जवाब देते हुए गुरु ने कहा। की मैं अपनी अधिकतर शिक्षाएं इंसानी मन और इंसानी मस्तिष्क से ही संबंधित रखता हूँ, क्योंकि सभी समस्याएं और सभी समाधान इन्हीं से उत्पन्न होते हैं।
इसीलिए अगर बाहर की दुनिया को सुधारना है तो सबसे पहले हमें हमारी भीतर की दुनिया को बदलना होगा। सबसे पहला चरण जो मैं अपने बच्चों को सीखाता हूँ वो होता है कि अपनी ख्याल ई दुनिया से कैसे बाहर आया जाए। अक्सर लोग अपनी ख्याल ई दुनिया में ही जीते रहते हैं। उनके विचार नाना प्रकार के विषयों में भटकते रहते हैं। इसीलिए सबसे पहले उनके मन को खयालों से खींचकर वर्तमान में लेकर आना है, यहाँ पर उपस्थित करना है और एक बार जब आपका मन उपस्थित होना सीख जाता है तो उसको कुछ भी सीखाना कठिन नहीं रह जाता। अब आप इस मन में कोई भी चीज़, कोई भी बात, कोई भी ज्ञान बड़ी आसानी से डाल सकते हैं। इसके लिए मैं अपने सभी बच्चों को जो पुराने हैं उन्हें भी और जो नए आते हैं उन्हें भी।
हर बार एक ही उपदेश देता हूँ उपदेश मैं आपको बताता हूँ। इसके बाद गुरु ने कहना शुरू किया कि अक्सर इंसान का ख्यालों में जाने का एक ही कारण होता है और एक ही कारण उसकी उदासी का होता है, उसकी निराशा का होता है। वो कारण क्या है? मैं यह नहीं कहूंगा कि इसका कारण आपके विचार है या आपका मन है, वो तो आपके काबू में है ही नहीं, उस पर तो आपका कोई मशीन नहीं है। क्या आप अपने आने वाले विचारों को रोक सकते हैं? क्या आप उन्हें बदल सकते हैं? आप उसे हरगिज नहीं बदल सकते। आप कितनी भी कोशिश कर लें, आप ऊपर से कितनी भी कोशिश कर लें लेकिन आप अपने मन को नहीं बदल पाएंगे। जब तक की
आप अपने मन को बदलने का विज्ञान नहीं सीख लेते, जब भी कोई बच्चा या कोई बड़ा कोई खेल खेलता है, अपना पसीना बहाता है, तो उसके सारे ख्याल मिट जाते हैं। सारे विचार शून्य हो जाते हैं और उसके अंदर एक आनंद की लहर दौड़ जाती है। भले ही वो बच्चा कितना भी उदास क्यों ना रहता हो। कितना ही निराश क्यों ना रहता हो, कितना ही अकेले पन में क्यों ना रहता हो।
लेकिन जब उसके शरीर से पसीना निकलता है मतलब जब वो मेहनत करता है तो उसका अकेलापन उसकी उदासी कुछ पलों के लिए तो दूर हो ही जाती है, ये तो हम सभी महसूस कर पाते हैं लेकिन ऐसा होता कैसे है? इसके पीछे विज्ञान क्या है? जब भी कोई आदमी मेहनत करता है, पसीना बहाता है तो उसकी सांसें तेज तेज चलने लगती है। मतलब उसकी सांसें जल्दी जल्दी बाहर और अंदर आने जाने लगती है। जब सांस अंदर जाती है तो हम कहते हैं कि ऑक्सीजन अंदर जा रही है और जब सांस पहाड़ आती है तो हम कहेंगे की कार्बन डाइऑक्साइड बाहर आती हैं।
अब जब मेहनत करने वाले इंसान की सांसे तेजी से चलने लगती है तो साधारण रूप से ज्यादा ऑक्सीजन उसके अंदर जाती है और ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड बाहर आती है। इसीलिए जब हमारे खून में ऑक्सीजन की मात्रा या कहें कि शुद्ध हवा का स्तर हमारे खून में बढ़ने लगता है तो हमारे खून में बढ़ने लगता है तो हमें आनंद की प्राप्ति होती है। हम खयालों से लौटकर वर्तमान में वापस आने लगते हैं। इसके साथ दूसरी प्रक्रिया भी हो रही है। मतलब गंदी हवा या कहें कि कार्बन डाइऑक्साइड हमारे खून से बाहर जा रही है और शुद्ध हवा।
हमारे अंदर जा रही है और जितनी ज्यादा मात्रा में शुद्ध हवा हमारे फेफड़ों में भरेगी, हमारे खून में भरेगी, उतने ही आनंद को हमारा मस्तिष्क महसूस कर पाएगा। इसलिए सबसे पहले और सबसे जरूरी सीडी होती है की अपने खून के अंदर अपने भेड़ों के अंदर शुद्ध हवा ज्यादा से ज्यादा भरनी और गंदी हवा ज्यादा से ज्यादा बाहर निकालने और इसके लिए मैं अपने शिष्यों को कोई खेल नहीं खिलाता, उन्हें भगाता, दौड़ाता नहीं हूँ। उन्हें बैठाकर प्रतिदिन रोज़ सुबह 2 घंटे उस प्रकार के योग अभ्यास कराता हूँ जो सांसों से जुड़े होते हैं।
इसीलिए जब कोई भी इंसान नित्य रूप से अपने शरीर के अंदर ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाने का प्रयास करता रहता है, ये प्रयास योग अभ्यास से भी हो सकते हैं या फिर ये किसी खेल के माध्यम से भी हो सकते हैं या नाच गाने से भी हो सकते हैं तो वो इंसान आनंद की तरफ अपना पहला कदम बढ़ाता है और यही कदम उसकी ध्यान की सबसे पहली सीढ़ी बनता है। यह उपदेश खत्म करने के बाद। गुरु ने हरीश के माता पिता से कहा की आप हरीश को तीन महीने के लिए मेरे पास यही गुरुकुल में छोड़ दें और तीन महीने बाद आप खुद अपने बेटे में बदलाव महसूस कर पाएंगे। ये सुनकर हरीश के माता पिता उस गुरु को प्रणाम करके और हरीश को उनके पास छोड़कर वापस चले जाते हैं। जब वो तीन महीने बाद वापस वहाँ पर आते हैं तो उनकी आंखें खुली की खुली रह जाती है।
वो हरीश जो हमेशा उदासी में रहता था, हमेशा अकेले पन में रहता था, कभी कोई काम नहीं करता था, आज वह एक गाय को नहलाने में लगा हुआ था और वो भी अपने मित्रों के साथ। हँस हंसकर बातें भी कर रहा था। यह दृश्य देखकर हरीश के माता पिता के मन में बहुत संतोष पहुंचा। उन्हें बहुत खुशी मिली और उन्होंने गुरु को प्रणाम करते हुए कहा कि हे गुरुदेव ये वैज्ञानिक प्रणाली जो आपने बताई है, ये समस्त मानव जाति का जीवन परिवर्तित कर सकती है। ये विधि केवल बच्चों के लिए नहीं है अपितु समस्त मानव जाति के लिए है। इन तीन महीनों में हमने भी आपके बताए अनुसार इन विधियों का पालन किया और हमारे अंदर भी हमने एक अभूतपूर्व बदलाव महसूस किया। हम धन्य हो गए आपसे ये ज्ञान लेकर। इसके बाद उन्होंने गुरु को प्रणाम किया।
और अपने बेटे को लेकर अपने घर की तरफ रवाना हो गए और पीछे से गुरु अपने शिष्य को जाते हुए देखता रहा तो दोस्तों कैसी लगी ये कहानी आपको कमेंट सेक्शन में जरूर बताना

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