कर्म कभी माफ़ नहीं करते | karma kabhi maaf nahi karte | hindi kahaniya | moral stories | hindi fairy tales

कर्म कभी माफ़ नहीं करते | karma kabhi maaf nahi karte | hindi kahaniya | moral stories | hindi fairy tales

दोस्तो आज की इस कहानी में आप सभी का स्वागत है | आज की इस कहानी का नाम है - कर्म कभी माफ़ नहीं करते | अगर आपको hindi kahaniya, moral stories, hindi stories, hindi fairy tales पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़े|

बुद्ध कहते हैं समुद्र, आकाश, पर्वत, गुफा इस लोक में ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ छिपकर बैठने से अपनी कर्मफल से बचा जा सके।

हम क्या होंगे, यह हमारी सोच पर निर्भर करता है। हमारे कर्म हमारी सोच का ही परिणाम होते हैं। जो कर्म हम करते हैं, उन्हीं का परिणाम भविष्य में हमें प्राप्त होता है। अच्छे कार्य अच्छे परिणामों को जन्म देते हैं, बुरे कर्म बुरे परिणामों को जन्म देते हैं। इसलिए कर्म करते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए जो कर्महीन होते हैं।

वह भी एक कर्म तो करते ही है और वह कर्म है कर्महीनता का कर्म और उस करम का क्या परिणाम हो सकता है, इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं। कर्म दो प्रकार के होते हैं एक वह कर्म जो हम भौतिक जगत में करते ही है और दूसरा कार जो हमारे अंतर में चलता है। अंतर में चलने वाले कर्मी ही भौतिक जगत में दिखाई देते हैं।

लेकिन अंतर में कुछ कर्म ऐसे होते हैं जो हम छिपाकर रखते हैं, जैसे किसी को देखकर उसके लिए मन में बहुत सारे बुरे विचार उत्पन्न हो जाते हैं और उसके लिए हम अपने मन में ही बुरे कर्म करने लगते हैं। बौद्धिक जगत में उन कर्मों को हम परगट नहीं कर सकते, क्योंकि जैसे ही वह कर्म प्रकट होंगे, आप बुरे साबित हो जाएंगे।

और आप ये नहीं चाहते, लेकिन हाँ, अगर आपको यह पता चल जाए कि आपको कोई देख नहीं रहा है, किसी को कुछ पता नहीं चलेगा तो आप उस क्रम को भौतिक जगत में करने से भी पीछे नहीं हटेंगे। कोई कुछ देख नहीं रहा है, यह आपका भ्रम है।

सब कुछ देखा जा रहा है। यह सत्य है और जिसके द्वारा देखा जा रहा है वह कोई और नहीं है। आप ही है, लेकिन इसका आपको पता नहीं है। जिसदिन आप किसी कर्म को करते समय अपने आप से छिप सकेंगे। उस दिन वह कर्म शक्तिहीन हो जाएगा, लेकिन कभी आप छिप नहीं सकेंगे। इसकी उल्टी अवस्था भी है जब आप अपने कर्म को संपूर्ण जागरण के साथ देख सकेंगे।

या देखेंगे तब भी उस कर्म का कर्मफल शक्तिहीन हो जाएगा। लेकिन आपको यह बात अच्छी नहीं लगे गी क्योंकि आप तो कोई भी कर्म फल के लिए ही करते है। भला एक ऐसा कर्म जिसमे फल ही ना मिले। आप क्यों करेंगे? धम्मपद में ही तीन भिक्षुओं की एक कथा है। एक बार तीन भिक्षु समूह अलग अलग मार्ग से बिहार लौट रहे थे।

पहला भिक्षु समूह जब वापस लौट रहा था तब उन्होंने मार्ग में एक जगह प्रचंड आग देखी। भिक्षु उस आग को देख ही रहे थे कि उनके देखते देखते एक कोवा उड़ता हुआ आया और उस आग में गिर कर मर गया, सभी भिक्षु या समझ नहीं पायी की ऐसी दर्दनाक घटना उसको वे के साथ क्यों घटी? अपनी इस प्रश्न का उत्तर ना मिलते देख उन्होंने निश्चय किया।

इस प्रश्न का उत्तर हम तथागत गौतम बुद्ध से पूछेंगे।

भिक्षुओं का एक दूसरा समूह नाव से यात्रा कर रहा था। नाव चलती चलती अचानक समुद्र में कहीं अटक गई। नाविक ने बहुत प्रयास किया लेकिन वह नाव वहाँ से हिलने को तैयार नहीं थी। जब बहुत प्रयास किया जा चुका तब यात्रियों ने सोचा इस नाव पर अवश्य ही कोई मनुष्य अभागा व्यक्ति है, जिसके कारण यह नाव आगे नहीं जा पा रही है।

उस व्यक्ति को ढूंढने के लिये यात्रियों ने एक नया तरीका निकाला। उन्होंने नाव पर मौजूद सभी लोगों के नाम की पर्ची बनाई और उन पर्चियों को एक साथ मिला दिया गया।

उनमें से जिसके भी नाम की पर्ची निकलती, वही मनुज समझा जाता। उस नाव पर मौजूद भिक्षुओं ने इसका विरोध किया, लेकिन बाकी यात्री मानने को तैयार नहीं थे। खुद नाविक भी यही चाहता था। जब पर्ची उठाई गई तो उसमें नाविक की पत्नी का नाम आया।

नाविक खुद इस तरीके में शामिल था तो वह कुछ कह नहीं सका। उन्होंने निश्चय किया कि बालू की बोरी बांधकर नाविक की पत्नी को समुद्र में फेंक दिया जाए।

लेकिन तभी एक भिक्षु ने कहा, आपको ऐसा नहीं करना चाहिए। अगर ये औरत मनुष है, अभागी है तो आप पर्चियों को पांच बार डाले। पांच बार अगर इन्हीं का नाम आता है तो ही कुछ कर ही नाविक इसके लिए तैयार था लेकिन बाकी यात्री तैयार नहीं थे। उन्हें डर था कि कहीं उनके नाम की पर्ची सामने ना आ जाए लेकिन नाविक के ज़ोर देने पर।

सब तैयार हो गए। पर्ची को दोबारा डाला गया। इस बार भी नाविक की पत्नी का ही नाम आया। पर्ची को तीसरी, चौथी और पांचवीं बार डाला गया। हर बार नाविक की पत्नी का ही नाम आया।

आप सब को विश्वास हो गया था कि वह औरत ही मनुष है, वहीं अब आगई है, जिसके कारण वह नाव समुद्र में अटक गई है।

खुद नाविक को भी भरोसा हो गया था कि उसकी पत्नी मनुष है और उसी की वजह से ही उसके सारे काम बिगड़ रहे हैं।

नाविक ने अपनी पत्नी की गले में बालू से भरा एक बोरा बांध दिया और उसे समुद्र में फेंक दिया।

भिक्षुओं ने विरोध किया, लेकिन उनकी कोई सुनने को तैयार नहीं था। अचानक से एक लहराई और वह नाव वहाँ से निकल गई भिक्षुगण समझ नहीं पायी कि उस औरत की मौत इस तरह से क्यों हुई? तब उन्होंने निश्चय किया कि वह इसका उत्तर तथागत गौतम बुद्ध से पूछेंगे। भिक्षुओं का एक तीसरा समूह कहीं जा रहा था। रात्रि में जगह नहीं मिलने पर।

वह सभी एक गुफा में जाकर सो गए। जब वह सुबह उठे तो उन्होंने देखा गुफा के द्वार पर एक बड़ी चट्टान पड़ी हुई है। वहाँ से बाहर निकलने का मार्ग अवरुद्ध हो गया था। तब उन्होंने गुफा से निकलने के लिए अन्य मार्ग तलाशना आरंभ किया। गुफा के अंदर मार्ग तलाशते तलाशते ही उन्हें 7 दिन बीत गए, तब किसी ने उनकी आवाज सुनी और उस बड़ी चट्टान को वहाँ से हटवाया।

और तबू है, उसको फांसी बाहर निकल पाए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अपने किस कर्म के कारण उन्हें इस गुफा में 7 दिन तक बंद रहना पड़ा। तब उन्होंने भी सोचा की इस बारे में तथागत गौतम बुद्ध से पूछेंगे।

तीनों भिक्षु समूह बुद्ध के पास पहुंचे। उन्होंने बुद्ध को सारी बात बताई और अपनी जिज्ञासा अपने पर्स नो को भी सामने रखा। बुद्ध ने अपनी अंतर्दृष्टि से देखकर भिक्षुओं को समझाया।

बुधनी कहा भूतकाल में एक किसान के पास एक आलसी बैल था। वह मन से काम नहीं करता था। किसान को अपना खेत जल्दी जोतना था, लेकिन वह बैल साथ नहीं दे रहा था। समय पर कार्य पूरा होता ना देख उस किसान को क्रोध आ गया और उसने पुआल में आग लगाकर उस बैल को जिंदा जला दिया। इस कारण उसे गोवा बनकर जन्म लेना पड़ा।

और उस कर्म की पूर्ति के लिए उसको वे को आग में गिरकर जिंदा जलकर मर ना पड़ा।

नाविक की पत्नी अपनी पूर्व जन्म में एक स्त्री थी। जब भी वह अपने घर से निकलती रास्ते में एक कुत्ता उसके साथ लग जाता। वह उसके आगे पीछे दौड़ता। लड़के उसको देखकर हंसते और उसका मजाक उड़ाते। वह उस कुत्ते से बहुत परेशान थी। वह चाहती थी कि वह कुत्ता कहीं चला जाए या तो मर जाए वह कुत्ता।

अपनी किसी पूर्व जन्म में उस स्त्री का पति था अतः उस मुँह के कारण वह उसका साथ नहीं छोड़ पा रहा था। उस महिला नहीं उस कुत्ते की हत्या करने की ठान ली थी। उसने कुत्ते को प्यार से बुलाया और उसे पुचकारा, उसके गले में एक भारी पत्थर बांधकर उसे पानी में फेंक दिया। कुत्ता डूब कर मर गया। इसी कारण उस नाविक की पत्नी को

इस जन्म में पानी में डूब कर मरना पड़ा। कुछ किशोरों ने खेल खेल में एक छिपकली को एक बिल में बंद कर दिया और गलती से वह उस बिल का दरवाजा खोलना भूल गए। सात दिनों बाद जब उन्हें याद आया कि उन्होंने एक छिपकली को बिल में बंद किया था तब उन्होंने उस बिल के दरवाजे को खोला लेकिन तब तक छिपकली मृतप्राय हो चुकी थी। अपनी इसी गलती के कारण

इस जन्म में उन्हें भिक्षुओं के रूप में गुफा मी कैद रहना पड़ा। बुद्ध के द्वारा दिए गए उत्तर सुनने के बाद भिक्षुओं ने बुद्ध से पूछा ये बुद्ध पाप कर्म करके क्या मनुष्य है, उसकी फल से बच सकता है या नहीं? मनुष्य अगर गुफा में छिप जाएं, धरती से भागकर समुद्र में यह पर्वत पर चला जाए या आकाश में पक्षियों की तरह उड़ जाए तो क्या वह

अपने आप को पाप की फल से बचा सकता है? बुद्ध ने कहा इस सृष्टि में कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ छिप कर अपनी पाप फल से बचा जा सके। जो कर्म हो चुका उसका परिणाम अवश्य सामने आता है। इसको टाला नहीं जा सकता जिसपर कार हमारी छाया हमारा साथ नहीं छोड़ती, उसी प्रकार हमारे कर्म भी हमारा साथ कभी नहीं छोड़ते।

इस कथा में पिछले जन्म की बात बताई गई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आपको यह छूट मिल जाती है कि हम अपने इस जन्म में जो चाहे करें, फालतू अगले जनम में ही मिलेगा। आपकी किसी भी कर्म का इफैक्ट दो तरफ होता है। एक अभी तुरंत और दूसरा भविष्य के लिए सुरक्षित हो जाता है और जब तक यह पूरा नहीं होता, आपके साथ चलता रहता है।

इसलिए अपने कर्मों पर ध्यान दीजिए

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