क्या खुद को जानते हैं | kya aap khud ko jaane hai | Short story in hindi |kahaniya | moral stories
क्या खुद को जानते हैं | kya aap khud ko jaane hai |short story | hindi kahaniya | moral stories | Motivational Story
स्वागत है | आज की इस कहानी का नाम है - क्या खुद को जानते हैं | अगर आपको short story, hindi kahaniya, moral stories, hindi stories, Motivational Story पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़े|
एक गुरु का एक शिष्य था। उस शिष्य के मन में बहुत सवाल थे जैसे छोटे बच्चो के सवाल होते हैं, ठीक उसी प्रकार के कभी वह गुरु से पूछता कि मछलियां पानी में ही क्यों होती है, जमीन पर क्यों नहीं? तो कभी पूछता की मरने के बाद हमारा क्या होता है? तो कभी पूछता कि भूत प्रेत होते हैं क्या? कभी पूछता की आकाश कितना बड़ा है 1 दिन गुरु ने?
अपने शिष्य से कहा अब मैं तुम्हारे सवालों के जवाब तब ही दूंगा जब तुम मुझसे कोई सार्थक सवाल करोगे तो उस सवाल को ढूंढो तभी मैं तुम्हारे किसी सवाल का जवाब दूंगा। शिष्य ने सवाल ढूंढने शुरू किए और उसने कई बड़े बड़े सवाल इकट्ठे कर लिए। वह गुरु के पास गया और कहा, गुरुदेव मेरा सवाल है, जब सुख है तो दुख की क्या जरूरत है? गुरु ने कोई जवाब नहीं दिया।
शिष्य ने फिर पूछा क्या ईश्वर है? गुरु ने फिर कोई जवाब नहीं दिया। शिष्य ने फिर से पूछा क्या हमारा पुनर्जन्म होता है? गुरु इस बार भी चुप ही रहे। इस तरह के कई सवाल उस शिष्य ने अपने गुरु से पूछ डाले। हर बार एक बड़ा सवाल लेकर वह आता पर गुरू चुपचाप ही रहते। वह सोचने लगा कि गुरु उसकी सवालों से बच रहे हैं, शायद गुरु को कुछ पता ही नहीं है। इसलिए वह चुप ही रहती है। यह सोचकर वह गुरु के पास गया और उनसे कहा, गुरुदेव कोई बात नहीं, आपको मेरे पर्सन का उत्तर नहीं पता, मैं जानता हूँ और आप जवाब नहीं देते क्योंकि आपको इनका जवाब पता ही नहीं और मुझे बेकार की पर्सन को खोजने में लगा रखा है। गुरु ने कहा हजारों सवाल नहीं, केवल एक ऐसा पर्सन लेकर आओ जिसे पूछकर जिसे जानकर तुम्हें तुम्हारे हर पर्सन का जवाब मिल जाए।
मैं तुम्हें तुम्हारे इन सारे पर्सन ओके उत्तर तो दे सकता हूँ, पर इसका क्या फायदा? जब हम खुद से कुछ जान ही न सकोगे। वह शिष्य सोच में पड़ गया कि ऐसा कौन सा पर्सन है, जिसे पूछकर सारे प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे? हर पर्सन अपने आप में ही अलग है। फिर भी वह दिन रात अलग अलग तरह की सवालों को ढूंढता रहा। पर कोई भी पर्सन उसे ऐसा नहीं लगा।
जिसे वह गुरु से पूछ सकें। एक महीना गुजरा दो महीने गुजरे तीन महीने गुजरे। ऐसे ही करते करते छह महीने गुजर गए। इन छे महीनों में शिष्य ने एक भी सवाल गुरु से नहीं किया था। 1 दिन शेष यह भिक्षा के लिए एक नगर में गया और वहाँ एक द्वार पर पहुंचा। उस द्वार पर एक सुंदर सी लड़की बाहर निकलकर आई। सन्यासी को देखते ही उस लड़की ने कहा, क्या आप जानते हैं मैं कौन हूँ? शिष्य ने कहा, नहीं, मैं तो केवल भिक्षा मांग रहा हूँ, लड़की ने काहा तो यही बता दो कि तुम कौन हो? शिष्य ने कहा मैं एक सन्यासी हूँ। लड़की ने कहा यह तो हमारे कर्म है, कर्म से मैं एक वेश्या हूँ और कर्म से तुम एक सन्यासी पर इन कर्मों को हटा दें तो हम कौन हैं? शिष्य अनिका? हाँ तब तुम एक लड़की हो और मैं एक लड़का हूँ। लड़की ने कहा।
लड़का या लड़की हो ना तो शरीर की बात है पर शरीर हटा दें तो हम क्या हैं? चलो यह सब बातें भी छोड़ो, यही बता दो कि तुम क्या हो? वैश्य कोई जवाब नहीं दे पाया पर यह सवाल उसके अंदर भीतर तक बैठ गया था। उसने अपने हाथों को ध्यान से देखा, अपनी उंगलियों को हिलाया और एक सवाल अपने आप से किया मैं क्या हूँ, मैं कौन हूँ?
यह सवाल लिए हुए और इसका उत्तर ढूंढ़ते हुए वह दौड़ता दौड़ता अपने गुरु के पास पहुंचा और उसने गुरु से कहा, गुरुदेव, एक सवाल है मेरा क्या आप जवाब देंगे? गुरु ने कहा, निर्भर करता है कि सवाल किसके ऊपर है और इसका जवाब कौन दे सकता है? फिर भी तुम सवाल पूछो मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करता हूँ शिष्य निकाह गुरुदेव, मैं क्या हूँ? मैं कौन हूँ?
गुरु ने शिष्य के मुख से यह सवाल सुना तो गुरु मुस्कुरा दिए और उन्होंने कहा बिल्कुल सही सवाल पूछा है, पर गलत व्यक्ति से पूछ रहे हो। शिष्य ने कहा गलत व्यक्ति से पूछ रहा हूँ पर मैं तो आपसे ही पूछ रहा हूँ, आप गुरु हैं, आप जानते होंगे मैं क्या हूँ और कौन हूँ? गुरु ने कहा, मैं जानता हूँ कि मैं क्या हूँ और कौन हूँ पर तुम कौन हो?
तुम क्या हो यह तुम से बेहतर कौन जान सकता है? यह बताओ कि तुम्हारा सबसे नजदीकी कौन है? शिष्य ने कहा अभी तो आप ही है गुरुदेव गुरु ने कहा नहीं, मुझ से भी ज्यादा नजदीक कौन है? शिष्य निकाह आपसे ज्यादा नजदीक तो मुझे कोई नहीं दिखाई दे रहा। गुरु ने कहा ध्यान से देखो कोई है तुम्हारे सबसे ज्यादा नजदीक।
शीशे को कुछ समझ नहीं आ रहा था। आखिरकार गुरुदेव कहना क्या चाहते हैं उनसे ज्यादा नजदीक तो कोई भी नहीं। वह मेरे बारे में सब जानते हैं। गुरु ने कहा क्या तुम्हारी सास से मुझसे ज्यादा नजदीक तुम्हारे पास नहीं है? शिष्य ने कहा हाँ, वह तो है, सांसे तो मेरे भीतर ही बसी है। गुरु ने कहा और इन सांसों से भी ज्यादा नजदीक कौन है? शिष्य ने कहा इनसे भी ज्यादा नजदीक।
इनसे ज्यादा नजदीक तो कोई नहीं। गुरु ने कहा, क्या तुम हाँ तुम क्या तुम अपने सबसे ज्यादा नजदीक नहीं हो? वह तुम्हीं तो हो जो तुम्हारे सबसे ज्यादा नजदीक है। यह कौन बताएगा कि तुम क्या हो, कौन हो, कौन तुम्हें सबसे अच्छी तरह जानता है? शिष्य ने कहा, आप सही कहते हैं गुरुदेव, मैं ही अपने सबसे ज्यादा नजदीक हूँ पर मैं आज तक यह जान नहीं पाया। बाहर की दुनिया में अपने नजदीकियों को ढूंढता रहा।
पर अपनी सिद्ध दूर हो गया। इतना दूर की मैं खुद के बारे में नहीं जानता कि मैं क्या हूँ, कौन हूँ? गुरु ने कहा जाये पर्सन उठते हैं क्या, कैसे और कौन और जिंस भी चीज़ के प्रति यहाँ पर सन पूछे जाते हैं। उस चीज़ के प्रति एक खोज शुरू हो जाती है। जिसे खोजा जाता है वह मिल ही जाता है। तो जब तुम्हारे भीतर या पर्सन उठा है तो यह तुम्हारी खोज का पहला चरण शुरू हो गया है।
और जब तुम अपने आप को खोज दे जाओगे तो तुम क्या हो? कौन हो इसका उत्तर तुम्हें अवश्य मिलेगा। मैं क्या कोई भी किसी को नहीं बता सकता कि वह क्या है और कौन है? यह है तो तुम खुद ही खोज सकते हो। शिष्य ने कहा, गुरुदेव मेरी आंखें खोलने के लिए धन्यवाद। मैं तो व्यर्थ के सवालों में ही उलझा हुआ था। मुझे सही सवाल से अवगत कराने के लिए आपका बहुत धन्यवाद मैं हूँ।
पर मैं क्या हूँ यह नहीं जानता। इसका मतलब मैं अंधा हूँ, आँखों से नहीं, मन से जो अपने आप को पढ़ नहीं पाया, अपने आप को अपने से दूर रखा, पर आपकी वजह से फिर से मैं अपनी नजदीक आ गया हूँ पर अब मैं अपने आप को जान कर रहूंगा कि मैं क्या हूँ, कैसा हूँ, कौन हूँ? फिर भी गुरुदेव एक सवाल का उत्तर तो
आपको देना ही होगा, मैं यह जानना चाहता हूँ। कि हम सब अपने से दूर क्यों हो जाते हैं? गुरु ने कहा, एक व्यक्ति रेगिस्तान में पानी खोज रहा था। बहुत दूर खोजने के बाद एक पहाड़ी के नीचे उसे कुछ नमी दिखाई दी और उसने वहाँ खोदना शुरू किया। बहुत खोदने के बाद आखिरकार नीचे उसे पानी मिल गया और उसने वही अपना घर बना लिया। लेकिन पानी इतना नहीं था कि सभी चीजों के लिए पूरा पड़ता तो वह जैसे तैसे कर थोड़े थोड़े पानी से काम चलाता रहा।
हर बार एक नया गड्ढा खोदता और ईश्वर से कहता की वर्षा काल पानी चाहिए। जैसे हम अपने दुखों में दूसरों को ढूंढ़ते हैं, सहारे के लिए कभी कोई मिलता है और कभी कोई मिलता है, कभी हमारे नजदीक कोई आता है और कभी कोई हमारे नजदीक दूसरा होता है तो पहले जो नजदीक था वह कभी कभी बहुत दूर हो जाता है और जो कभी बहुत दूर था वह नजदीक हो जाता है। और यही करते करते हमारी पूरी जिंदगी निकल जाती है और वास्तव में जो हमारे नजदीक है यानी हम खुद के नजदीक है, जिसे हमने बहुत दूर बैठा रखा है। जिसे हम कभी पूछते भी नहीं। उसकी और हमारा ध्यान कभी जाता ही नहीं, क्योंकि हमारी खोज पूरी हो चुकी, हम समझ चूके की हम कौन हैं हम रमेश, दिनेश, राणा खाना, कविता, सविता और न जाने क्या क्या है, कोई राजा है।
कोई मंत्री है, कोई सिपाही है, कोई किसान है तो कोई मजदूर हैं, कोई गुलाम है तो हम सब को हमारे बारे में सब पता है। जब हम यह मान चूके कि हम क्या हैं तो खोज बंद हो गई। इसी तरह उस व्यक्ति ने भी अपनी पूरी जिंदगी वहाँ गड्ढा खोद खोदकर बड़ी परेशानी में अपना पूरा जीवन बिता दिया क्योंकि उसे लगता था कि इस रेगिस्तान में अगर वह आगे बढ़ा तो उसे कहीं दूर दूर तक पानी नहीं मिलेगा।
इसी तरह हमें हमारे बारे में सब पता है। यह जानकर हम आगे नहीं बढ़ते और वहीं मर जाती है क्योंकि वह व्यक्ति भी बूढ़ा होकर वहीं मर गया। पर अगर उसने हिम्मत करके वह पहाड़ चढ़ा होता तो उस पहाड़ की दूसरी ओर पानी के झरने थे, हरियाली थी और उसने वह खो दिया जो उसे मिल सकता था, जिसे वह जान सकता था।
इसी तरह यह मानकर कि हम कौन हैं यह हम जानते हैं। ऐसा समझकर हम कभी अपने तक नहीं पहुँच पाते। शिष्य अपने आप को जानने में लग गया और वह अपने आप को जान पाया या नहीं, यह तो वही जानें। वह बात तो हमारी है। हम अपने आप को जानते हैं। संसार कहेगा हाँ तुम जानते हो, पर संसार को तो डोंगी तो पता चलेगा कि तुम तो कुछ भी नहीं जानते। अपने सबसे नजदीक होकर।
अपने आप को नहीं जानते इससे बड़ी अज्ञानता क्या होगी अब इस बात को बहुत सीरियस मत लेना क्योंकि जब हम किसी चीज़ के प्रति बहुत गंभीर हो जाते हैं तो वह चीजें बिगड़ जाती है क्योंकि जीवन सिरियस होने का नाम नहीं है जो जीवन के प्रति सिरियस हो गया गंभीर हो गया वह कभी नहीं जी पाया
एक गुरु का एक शिष्य था। उस शिष्य के मन में बहुत सवाल थे जैसे छोटे बच्चो के सवाल होते हैं, ठीक उसी प्रकार के कभी वह गुरु से पूछता कि मछलियां पानी में ही क्यों होती है, जमीन पर क्यों नहीं? तो कभी पूछता की मरने के बाद हमारा क्या होता है? तो कभी पूछता कि भूत प्रेत होते हैं क्या? कभी पूछता की आकाश कितना बड़ा है 1 दिन गुरु ने?
अपने शिष्य से कहा अब मैं तुम्हारे सवालों के जवाब तब ही दूंगा जब तुम मुझसे कोई सार्थक सवाल करोगे तो उस सवाल को ढूंढो तभी मैं तुम्हारे किसी सवाल का जवाब दूंगा। शिष्य ने सवाल ढूंढने शुरू किए और उसने कई बड़े बड़े सवाल इकट्ठे कर लिए। वह गुरु के पास गया और कहा, गुरुदेव मेरा सवाल है, जब सुख है तो दुख की क्या जरूरत है? गुरु ने कोई जवाब नहीं दिया।
शिष्य ने फिर पूछा क्या ईश्वर है? गुरु ने फिर कोई जवाब नहीं दिया। शिष्य ने फिर से पूछा क्या हमारा पुनर्जन्म होता है? गुरु इस बार भी चुप ही रहे। इस तरह के कई सवाल उस शिष्य ने अपने गुरु से पूछ डाले। हर बार एक बड़ा सवाल लेकर वह आता पर गुरू चुपचाप ही रहते। वह सोचने लगा कि गुरु उसकी सवालों से बच रहे हैं, शायद गुरु को कुछ पता ही नहीं है। इसलिए वह चुप ही रहती है। यह सोचकर वह गुरु के पास गया और उनसे कहा, गुरुदेव कोई बात नहीं, आपको मेरे पर्सन का उत्तर नहीं पता, मैं जानता हूँ और आप जवाब नहीं देते क्योंकि आपको इनका जवाब पता ही नहीं और मुझे बेकार की पर्सन को खोजने में लगा रखा है। गुरु ने कहा हजारों सवाल नहीं, केवल एक ऐसा पर्सन लेकर आओ जिसे पूछकर जिसे जानकर तुम्हें तुम्हारे हर पर्सन का जवाब मिल जाए।
मैं तुम्हें तुम्हारे इन सारे पर्सन ओके उत्तर तो दे सकता हूँ, पर इसका क्या फायदा? जब हम खुद से कुछ जान ही न सकोगे। वह शिष्य सोच में पड़ गया कि ऐसा कौन सा पर्सन है, जिसे पूछकर सारे प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे? हर पर्सन अपने आप में ही अलग है। फिर भी वह दिन रात अलग अलग तरह की सवालों को ढूंढता रहा। पर कोई भी पर्सन उसे ऐसा नहीं लगा।
जिसे वह गुरु से पूछ सकें। एक महीना गुजरा दो महीने गुजरे तीन महीने गुजरे। ऐसे ही करते करते छह महीने गुजर गए। इन छे महीनों में शिष्य ने एक भी सवाल गुरु से नहीं किया था। 1 दिन शेष यह भिक्षा के लिए एक नगर में गया और वहाँ एक द्वार पर पहुंचा। उस द्वार पर एक सुंदर सी लड़की बाहर निकलकर आई। सन्यासी को देखते ही उस लड़की ने कहा, क्या आप जानते हैं मैं कौन हूँ? शिष्य ने कहा, नहीं, मैं तो केवल भिक्षा मांग रहा हूँ, लड़की ने काहा तो यही बता दो कि तुम कौन हो? शिष्य ने कहा मैं एक सन्यासी हूँ। लड़की ने कहा यह तो हमारे कर्म है, कर्म से मैं एक वेश्या हूँ और कर्म से तुम एक सन्यासी पर इन कर्मों को हटा दें तो हम कौन हैं? शिष्य अनिका? हाँ तब तुम एक लड़की हो और मैं एक लड़का हूँ। लड़की ने कहा।
लड़का या लड़की हो ना तो शरीर की बात है पर शरीर हटा दें तो हम क्या हैं? चलो यह सब बातें भी छोड़ो, यही बता दो कि तुम क्या हो? वैश्य कोई जवाब नहीं दे पाया पर यह सवाल उसके अंदर भीतर तक बैठ गया था। उसने अपने हाथों को ध्यान से देखा, अपनी उंगलियों को हिलाया और एक सवाल अपने आप से किया मैं क्या हूँ, मैं कौन हूँ?
यह सवाल लिए हुए और इसका उत्तर ढूंढ़ते हुए वह दौड़ता दौड़ता अपने गुरु के पास पहुंचा और उसने गुरु से कहा, गुरुदेव, एक सवाल है मेरा क्या आप जवाब देंगे? गुरु ने कहा, निर्भर करता है कि सवाल किसके ऊपर है और इसका जवाब कौन दे सकता है? फिर भी तुम सवाल पूछो मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करता हूँ शिष्य निकाह गुरुदेव, मैं क्या हूँ? मैं कौन हूँ?
गुरु ने शिष्य के मुख से यह सवाल सुना तो गुरु मुस्कुरा दिए और उन्होंने कहा बिल्कुल सही सवाल पूछा है, पर गलत व्यक्ति से पूछ रहे हो। शिष्य ने कहा गलत व्यक्ति से पूछ रहा हूँ पर मैं तो आपसे ही पूछ रहा हूँ, आप गुरु हैं, आप जानते होंगे मैं क्या हूँ और कौन हूँ? गुरु ने कहा, मैं जानता हूँ कि मैं क्या हूँ और कौन हूँ पर तुम कौन हो?
तुम क्या हो यह तुम से बेहतर कौन जान सकता है? यह बताओ कि तुम्हारा सबसे नजदीकी कौन है? शिष्य ने कहा अभी तो आप ही है गुरुदेव गुरु ने कहा नहीं, मुझ से भी ज्यादा नजदीक कौन है? शिष्य निकाह आपसे ज्यादा नजदीक तो मुझे कोई नहीं दिखाई दे रहा। गुरु ने कहा ध्यान से देखो कोई है तुम्हारे सबसे ज्यादा नजदीक।
शीशे को कुछ समझ नहीं आ रहा था। आखिरकार गुरुदेव कहना क्या चाहते हैं उनसे ज्यादा नजदीक तो कोई भी नहीं। वह मेरे बारे में सब जानते हैं। गुरु ने कहा क्या तुम्हारी सास से मुझसे ज्यादा नजदीक तुम्हारे पास नहीं है? शिष्य ने कहा हाँ, वह तो है, सांसे तो मेरे भीतर ही बसी है। गुरु ने कहा और इन सांसों से भी ज्यादा नजदीक कौन है? शिष्य ने कहा इनसे भी ज्यादा नजदीक।
इनसे ज्यादा नजदीक तो कोई नहीं। गुरु ने कहा, क्या तुम हाँ तुम क्या तुम अपने सबसे ज्यादा नजदीक नहीं हो? वह तुम्हीं तो हो जो तुम्हारे सबसे ज्यादा नजदीक है। यह कौन बताएगा कि तुम क्या हो, कौन हो, कौन तुम्हें सबसे अच्छी तरह जानता है? शिष्य ने कहा, आप सही कहते हैं गुरुदेव, मैं ही अपने सबसे ज्यादा नजदीक हूँ पर मैं आज तक यह जान नहीं पाया। बाहर की दुनिया में अपने नजदीकियों को ढूंढता रहा।
पर अपनी सिद्ध दूर हो गया। इतना दूर की मैं खुद के बारे में नहीं जानता कि मैं क्या हूँ, कौन हूँ? गुरु ने कहा जाये पर्सन उठते हैं क्या, कैसे और कौन और जिंस भी चीज़ के प्रति यहाँ पर सन पूछे जाते हैं। उस चीज़ के प्रति एक खोज शुरू हो जाती है। जिसे खोजा जाता है वह मिल ही जाता है। तो जब तुम्हारे भीतर या पर्सन उठा है तो यह तुम्हारी खोज का पहला चरण शुरू हो गया है।
और जब तुम अपने आप को खोज दे जाओगे तो तुम क्या हो? कौन हो इसका उत्तर तुम्हें अवश्य मिलेगा। मैं क्या कोई भी किसी को नहीं बता सकता कि वह क्या है और कौन है? यह है तो तुम खुद ही खोज सकते हो। शिष्य ने कहा, गुरुदेव मेरी आंखें खोलने के लिए धन्यवाद। मैं तो व्यर्थ के सवालों में ही उलझा हुआ था। मुझे सही सवाल से अवगत कराने के लिए आपका बहुत धन्यवाद मैं हूँ।
पर मैं क्या हूँ यह नहीं जानता। इसका मतलब मैं अंधा हूँ, आँखों से नहीं, मन से जो अपने आप को पढ़ नहीं पाया, अपने आप को अपने से दूर रखा, पर आपकी वजह से फिर से मैं अपनी नजदीक आ गया हूँ पर अब मैं अपने आप को जान कर रहूंगा कि मैं क्या हूँ, कैसा हूँ, कौन हूँ? फिर भी गुरुदेव एक सवाल का उत्तर तो
आपको देना ही होगा, मैं यह जानना चाहता हूँ। कि हम सब अपने से दूर क्यों हो जाते हैं? गुरु ने कहा, एक व्यक्ति रेगिस्तान में पानी खोज रहा था। बहुत दूर खोजने के बाद एक पहाड़ी के नीचे उसे कुछ नमी दिखाई दी और उसने वहाँ खोदना शुरू किया। बहुत खोदने के बाद आखिरकार नीचे उसे पानी मिल गया और उसने वही अपना घर बना लिया। लेकिन पानी इतना नहीं था कि सभी चीजों के लिए पूरा पड़ता तो वह जैसे तैसे कर थोड़े थोड़े पानी से काम चलाता रहा।
हर बार एक नया गड्ढा खोदता और ईश्वर से कहता की वर्षा काल पानी चाहिए। जैसे हम अपने दुखों में दूसरों को ढूंढ़ते हैं, सहारे के लिए कभी कोई मिलता है और कभी कोई मिलता है, कभी हमारे नजदीक कोई आता है और कभी कोई हमारे नजदीक दूसरा होता है तो पहले जो नजदीक था वह कभी कभी बहुत दूर हो जाता है और जो कभी बहुत दूर था वह नजदीक हो जाता है। और यही करते करते हमारी पूरी जिंदगी निकल जाती है और वास्तव में जो हमारे नजदीक है यानी हम खुद के नजदीक है, जिसे हमने बहुत दूर बैठा रखा है। जिसे हम कभी पूछते भी नहीं। उसकी और हमारा ध्यान कभी जाता ही नहीं, क्योंकि हमारी खोज पूरी हो चुकी, हम समझ चूके की हम कौन हैं हम रमेश, दिनेश, राणा खाना, कविता, सविता और न जाने क्या क्या है, कोई राजा है।
कोई मंत्री है, कोई सिपाही है, कोई किसान है तो कोई मजदूर हैं, कोई गुलाम है तो हम सब को हमारे बारे में सब पता है। जब हम यह मान चूके कि हम क्या हैं तो खोज बंद हो गई। इसी तरह उस व्यक्ति ने भी अपनी पूरी जिंदगी वहाँ गड्ढा खोद खोदकर बड़ी परेशानी में अपना पूरा जीवन बिता दिया क्योंकि उसे लगता था कि इस रेगिस्तान में अगर वह आगे बढ़ा तो उसे कहीं दूर दूर तक पानी नहीं मिलेगा।
इसी तरह हमें हमारे बारे में सब पता है। यह जानकर हम आगे नहीं बढ़ते और वहीं मर जाती है क्योंकि वह व्यक्ति भी बूढ़ा होकर वहीं मर गया। पर अगर उसने हिम्मत करके वह पहाड़ चढ़ा होता तो उस पहाड़ की दूसरी ओर पानी के झरने थे, हरियाली थी और उसने वह खो दिया जो उसे मिल सकता था, जिसे वह जान सकता था।
इसी तरह यह मानकर कि हम कौन हैं यह हम जानते हैं। ऐसा समझकर हम कभी अपने तक नहीं पहुँच पाते। शिष्य अपने आप को जानने में लग गया और वह अपने आप को जान पाया या नहीं, यह तो वही जानें। वह बात तो हमारी है। हम अपने आप को जानते हैं। संसार कहेगा हाँ तुम जानते हो, पर संसार को तो डोंगी तो पता चलेगा कि तुम तो कुछ भी नहीं जानते। अपने सबसे नजदीक होकर।
अपने आप को नहीं जानते इससे बड़ी अज्ञानता क्या होगी अब इस बात को बहुत सीरियस मत लेना क्योंकि जब हम किसी चीज़ के प्रति बहुत गंभीर हो जाते हैं तो वह चीजें बिगड़ जाती है क्योंकि जीवन सिरियस होने का नाम नहीं है जो जीवन के प्रति सिरियस हो गया गंभीर हो गया वह कभी नहीं जी पाया

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