पाप करने में हमें आनंद क्यों आता है | paap karne ma hame anand kyon ata hai | hindi kahaniya | moral stories | Motivational Story

पाप करने में हमें आनंद क्यों आता है | paap karne ma hame anand kyon ata hai | hindi kahaniya | moral stories | Motivational Story
स्वागत है | आज की इस कहानी का नाम है - पाप करने में हमें आनंद क्यों आता है| अगर आपको hindi kahaniya, moral stories, hindi stories, Motivational Story पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़े|

बुद्ध कहती हैं, अगर आप दूसरों के लिए दिया जलाते हैं तो ये है आपके रास्ते को भी रोशन करता है। इसके विपरीत अगर आप दूसरों के लिए गड्ढा खोदते है तो उस गड्ढे में आप स्वयं ही गिर जाते हैं, दिया पुण्य है और वह गड्ढा पाप। किसी ने पूछा था कि पाप करने में इतना मज़ा क्यों आता है कि हम सभी?

किसी न किसी तरीके से किसी ना किसी पाप में लिप्त रहते ही हैं। हमारे मन को सब कुछ चाहिए जो कुछ भी हो सीमित असीमित, कहीं भी कैसा भी जैसा भी हो, सब कुछ उसे चाहिए, उसके चाहने की कोई सीमा नहीं है और यही चाहत आपसे सब कुछ करा लेती है। अच्छा बुरा पाप पुण्य है। सब इसी से आते हैं लेकिन ये पाप क्या है?

पाप प्रतिबंधित कर्म है। ऐसे ही कर्म जिनको करने के लिए आपको मना किया गया है और इसे मना किसने किया है? कुछ जागरूक लोगों ने जिन्होंने देखा कि इन कर्मों के कारण मनुष्य और मनुष्यता का पालन हो जाता है, उसके जीवन से खुशियां दूर चली जाती है और इसका समाज पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। लेकिन किसी के मना करने से आप रुकने वाले थोड़े ही है।

जैसे छोटा सा बच्चा किसी दिये की ओर बढ़ता है और उसे पकड़ने के लिए उसके माता पिता उसे मना करते हैं। वह जानते हैं कि इससे उसकी हानि हो सकती है तो वह उसे रोकते हैं, प्रतिबंधित करते हैं, उसे मना करते हैं लेकिन बच्चा रुकने वाला थोड़े ही है। एक ना 1 दिन वह उस दिए को पकड़ ही लेता है। पकड़ने के बाद उसे पता चलता है की उससे गलती हो गयी है और फिर कभी

वह उस दिए की ओर नहीं बढ़ता। बच्चा रुक सकता है लेकिन आप नहीं रुकते। आप बार बार उस दिए को पकड़ते हैं, हाथ जला बैठते हैं, लेकिन फिर से उसी क्रम के लिए तैयार हो जाते हैं, आप जानते बूझते पाप करते है। क्या करें पाप में आनंद और लाभ अधिक दिखाई देता है और आप की मासूमियत भी कुछ ऐसी है की अगर आपके साथ कुछ गलत हो जाए तो आप सर उठाकर ऊपर देखते हुए कहेंगे।

मैंने क्या बुरा किया? मेरे साथ ऐसा क्यों? पाप की खासियत भी कुछ ऐसी ही होती है। जब तक यह सर पर सवार रहता है तब तक यह एक ऐसी मायाजाल का निर्माण करता रहता है जिसमे आपको एक अलग ही सुख और आनंद की प्राप्ति होती है। जबकि आप जानते हैं की यह गलत है और इसी कारण से कि यह प्रतिबंधित कर्म है, इसको मना किया गया है। आपको और अधिक आनंद की प्राप्ति होती है।

आपने देखा जब तक आप किसी पाप को कर रहे होते हैं आप को आनंद और सुख की प्राप्ति होती है। आपन दे होकर उस कार में लिप्त रहते हैं और जैसे ही पाप कार्य खत्म होता है, उसका आनंद भी खत्म हो जाता है। उसका सुख भी उड़ जाता है और तुरंत ही वह व्यक्ति आत्मग्लानि से भर जाता है। पछताता है और सोचता है कि मैंने यह क्या किया अचानक से जैसे

उसे अच्छे और बुरे का ज्ञान होने लगता है। अब वह साफ साफ देख सकता है कि क्या गलत है, क्या सही है और उसने जो कार्य किया है वह है पाप ही है। अंतर की ज्ञान चाकसू जैसे खुल जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आपके मन को जो चाहिए था उसे पाने के लिए मन नहीं एक मायाजाल की रचना की थी, जिसमें फंसकर आपने वह पाप कार्य किया।

और कार्य हो जाने के बाद मायाजाल टूट गया और आपको सत्य साफ साफ दिखाई देने लगा। लेकिन ऐसा थोड़े समय के लिए ही होता है। फिर से मन माया का निर्माण करता है और किसी दूसरे कार्य के लिए आपको प्रेरित करता है और फिर से आप अंधे हो जाते हैं और यही माया आपको दिखाती है कि आप सर्वशक्तिशाली है? आप सबसे अच्छे हैं, आप भगवान की बराबर है।

आप दयावान है, लोग आपको पूछते हैं आपकी इज्जत करते हैं, आप का सम्मान करते हैं। अगर आप छोटी मोटी कुछ गलतियाँ करते हैं तो किसी को क्या पता चलने वाला है? बड़ा पाप भी करेंगे तो भी कोई विश्वास तो करेगा? नहीं देख कौन रहा है? अगर कोई देख भी रहा है तो उसे निपटा देंगे। एक कहानी है एक भिक्षु के पास एक राजा आया राजा चक्रवर्ती सम्राट था। उसने पूरी धरती को जीत लिया था, वह बूढ़ा हो चुका था। बुढ़ापे में ही कुछ अक्ल आती है, पर तब समय नहीं रहता। उसने भिक्षु से कहा, आप मेरा मार्गदर्शन कीजिए, जब मैं युवा था तब मैंने बहुत पाप किये। मैंने निर्दोषों की हत्या की, यहाँ तक कि मैंने अपने भाइयों की भी हत्या की। सिंहासन को पाने के लिए उनकी पत्नियों को जबरदस्ती अपने पास रखा।

कई लोगों को धोखा दिया। उनका सब कुछ लूट लिया। शायद ही ऐसा कोई पाप होगा जो मैंने ना किया हो। मैंने इन पापों से मुक्ति के लिए कई तरह के अनुष्ठान किये। जैसा ज्ञानी व्यक्तियों ने कहा वैसा वैसा किया, हर कार्य किया, हर कर्म किया, मैंने इन पापों से मुक्त होने के लिए सब कुछ किया, लेकिन अब मुझे रातों को नींद नहीं आती। मुझे रात में अपने द्वारा किए गए सभी पाप कर्म एक एक करके दिखाई देते हैं। मन आत्मग्लानि से भरा हुआ है। पछतावा होता है और सोचता हूँ कि यह सब मैंने कैसे किया? आप मुझे कोई ऐसा मार्ग बताएं जिससे मैं अपने सभी पापों से मुक्त और शुद्ध हो जाऊं? भिक्षु ने कहा, क्या आप अपना कवच उतारकर अपनी छाती मुझे दिखा सकते हैं? राजा ने अपना कवच उतार दिया, उसने अपनी छाती दिखाई। उसकी छाती पर अनेक घाव के निशान थे, भिक्षु।

ने कहा, यह गांव आपको कैसे लगे? राजा ने कहा, इनमें से हर घाव की अपनी एक अलग कहानी है। अनेकों युद्ध में बड़े बड़े अजय योद्धाओं से लड़ते हुए यह घाव लगे हैं। भिक्षु ने कहा, अगर तुम अपनी छाती से इन घावों के निशानों को गायब कर दो तो मैं तुम्हें तुम्हारे पाप से मुक्त कर सकता हूँ। यह सुनकर राजा बहुत खुश हुआ और वह अपने राज्य में वापस चला गया।

वह अपनी राजवैध को बुलाकर उसने कहा मेरी छाती की यह घाव के निशान गायब कर दो या निशान दिखने नहीं चाहिये। राजवैद्य ने कहा, यह संभव नहीं है। गांव को भरा जा सकता है लेकिन घाव के निशानों को हटाया नहीं जा सकता। यह हमेशा रहते है। राजा ने बाहर से भी वैद्यों को बुलाया, लेकिन सबने उन निशाने को मिटाने में असमर्थता ज़ाहिर कर दी। राजा वापस भिक्षु के पास आया और कहा मेरी छाती की ये निशान मिटने वाले तो नहीं है। इसका मतलब यह है कि मैं कभी भी अपने पाप कर्मों से मुक्त नहीं हो पाऊंगा। भिक्षु ने कहा, राजन् जिसपर कार इन घावों के निशानों को मिटाया नहीं जा सकता, उसी प्रकार जीवन में किए गए कर्म अपना निशान छोड़ देते हैं और इन निशाने को भी मिटाया या हटाया नहीं जा सकता भिक्षु ने।

जमीन पर एक लकीर खींचते हुए कहा, देखो यह तुम्हारे पाप है, क्या तुम्हें दिख रहे हैं? राजा ने कहा हाँ, मुझे अपने पाप दिखाई दे रहे हैं। तब बिच्छू ने एक बहुत बड़ी लकीर उस लकीर के बिल्कुल बराबर में खींची। यह लकीर इतनी बड़ी थी कि भिक्षुकों 100 कदम चलना पड़ा। तब भिक्षु राजा कोई किनारे पर ले गया और कहा यहाँ से देख कर बताओ राजन क्या तुम्हें तुम्हारे पाप कर्म की लकीर दिखाई दे रही है?

राजा ने कहा, नहीं, यह मुझे नहीं दिखाई दे रही है। भिक्षुओं ने कहा तुम्हे कौन सी लकीर दिखाई दे रही है? राजा ने कहा वह बड़ी लकीर जो आपने खींची है। भिक्षु ने कहा, उस बड़ी लकीर को तुम पुण्य समझो। अगर तुम अपने पुण्यों को अपने सद्कर्मों को इस लकीर की तरह बढ़ा कर लोगे तो तुम्हारे पाप भी उसी तरह छोटे पड़ जाएंगे, जिसतरह वह लकीर पड़ गई है।

जो दिखाई भी नहीं दे रही लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह पाप मिट जाएंगे। वह वही रहेंगे जहाँ है जैसे तुम्हारे इस कवच ने तुम्हारे घावों को छुपा रखा है और यह कवच दूसरे नए घावों से तुम्हारी रक्षा करता है, उसी तरह सत्कर्म भी इस कवच की भाँति ही तुम्हारी पापों से रक्षा करते हैं। राजा ने कहा, मैं आपकी बात भली भांति समझ गया हूँ।

लेकिन मैं सब कुछ कर चुका हूँ। मैं तीर्थ भी घूम चुका हूँ। गो दान भी कर चुका हूँ। सब अनुष्ठान कर लिए, मंदिर में धन दौलत भी दे दी, अब क्या बचा जिससे मैं पुण्य कमा सकूँ? भिक्षु ने कहा, पुण्य आप के अंतर से उत्पन्न सत्कर्मों से उत्पन्न होते हैं। राजा ने कहा मैं समझा नहीं भिक्षु ने कहा मेरे साथ चलो भिक्षु ने राजा को साधारण कपड़े देकर कहा इन्हें पहन लो। और अकेले में मेरे साथ चलो राजा साथ चलने के लिए तैयार हो गया। भिक्षु और राजा काफी दूर चलने के बाद एक गांव में पहुंचे। उस गांव के बहार एक छोटी सी झोपड़ी थी। उस झोपड़ी के सामने एक औरत अपने बच्चे को लेकर बैठी थी। उस औरत की हालत बहुत खराब थी। उसकी झोपड़ी टूटी फूटी थी, उसके कपड़े भी फटे पुराने थे। ऐसा लग रहा था कि जैसे वह वहाँ किसी का इंतजार कर रही हो।

राजा नहीं उस औरत की हालत देखकर बिच्छू से कहा इस औरत को क्या परेशानी है? इस औरत पर दया आती है। मैं अभी इसकी झोपड़ी को सोने चांदी से भर सकता हूँ। भिक्षु ने कहा वह तुम्हारा कुछ भी नहीं लेगी। राजा ने कहा ऐसा क्यों? मिशु ने कहा, आज से 4 साल पहले इस औरत के पति को राजा ने इसलिए मृत्युदंड दिया था क्योंकि वह राजा के मार्ग में आ गया था।

और राजा के सिपाहियों ने इस औरत के सामने ही उसके पति की हत्या कर दी थी। यह सुनकर राजा को बहुत धक्का लगा। राजा ने कहा, मैं इसका प्रायश्चित करना चाहता हूँ। बिच्छू ने कहा, यह कपड़े लो और यह भोजन भी लोग और जब यह औरत भीतर चली जाये तब उसके द्वार पर रख देना। कुछ देर बाद वह औरत झोंपड़ी के अंदर चली गई, तब राजा ने वह कपड़े और भोजन वहाँ पर रख दिया। राजा पलटकर जैसे ही चलने को तैयार हुआ वह औरत भीतर से भागकर आई और राजा के चरणों में गिर गई और कहा आप रोज़ हमारे लिए भोजन रखकर जाते हैं, मैं आपकी बहुत आभारी हूँ। मैं आप का ही इंतजार कर रही थी। आप मेरे लिए ईश्वर के समान है, ईश्वर आपको लंबी आयु दे। राजा बिना कुछ कहे चुपचाप तेजी से वहाँ से निकल गया और भिक्षु के पास पहुँचकर भरे हुए गले से कहा।

मैं अपनी पाप की बोझ के तले दबा जा रहा हूँ, मुझे बताएं की उस औरत के प्रति मैं अपनी पाप कर्म से कैसे मुक्त हो जाऊं? विष्णु ने कहा, कर्मों को मिटाया नहीं जा सकता, फिर भी पाप कर्म के प्रभाव को कम किया जा सकता है। राजा ने कहा, मुझे क्या करना होगा? भिक्षु ने कहा, किसी दूसरे राजा को जीतने जैसा यह आसान कार्य नहीं है। क्या तुम कर पाओगे? राजा ने कहा आप मुझे बताएं क्या करना होगा? भिक्षु ने कहा, तुम्हें उस औरत के पास जाकर अपनी किए गए पाप कर्म की माफी मांगनी होगी। तुम्हें यह स्वीकार करना होगा कि तुम से गलती हो गई है और तुम उसके लिए पछता रहे हो।

बहुत हिम्मत करके रजा भिक्षु के साथ उस औरत की झोपड़ी पर पहुंचा और उस राजा ने उस औरत से क्षमा प्रार्थना की और उसे बताया कि वह वही राजा है जिसने उसके पति को मृत्यु दंड दिया था। यह सुनकर वह औरत भीतर से खंजर लेकर आई और उस राजा पर वार करने के लिए अपना हाथ उठाया। तभी भिक्षु ने उस औरत को रोकते हुए कहा, पुत्री, यह राजा बुरा हो सकता है, लेकिन तुम तो बुरी नहीं होना भिक्षु की बात सुनकर उस औरत ने वह खंजर अपने हाथ से छोड़ दिया। उस सूरत ने कहा, मैं राजा को मार नहीं सकती तो मैं इस राजा को क्षमा भी नहीं करूँगी और यह कहकर वह औरत झोंपड़ी के भीतर चली गई। राजा और भिक्षु वहाँ से आगे चले गए। राजा ने कहा, भले ही उस औरत ने मुझे क्षमा ना किया हो, लेकिन पता नहीं क्यों भीतर एक शांति सी छा गई है। कुछ हल्का सा लग रहा है, कुछ अच्छा सा लग रहा है।

मिश्रा ने कहा, बिना किसी लालच के जब हम किसी से क्षमा मांगते हैं तो हमारे द्वारा किया गया पाप कर्म प्रभावहीन होने लगता है, क्योंकि क्षमा करना और क्षमा मांगना दोनों ही पुण्य कर्म है। लेकिन यह दोनों कम करने के लिये व्यक्ति के अंदर प्रबल दृढ़ क्षमता होनी चाहिए। भिक्षु और वह राजा एक रोगी के घर पर पहुंचे। राजा ने कहा, यह घर तो किसी नीची जाति वाले का लगता है।

यहाँ जाना उचित नहीं है। भिक्षु ने कहा, राजन् मनुष्य मनुष्य होता है। रोगी रोगी मनुष्यता समानता सिखाती है, भेदभाव करना नहीं। जो व्यक्ति मनुष्य मनुष्य में भेद करने लगे, वह कभी सत्कर्म कर ही नहीं सकता। भेदभाव स्वयं में एक पाप कर्म है। राजा ने कहा, मैं समझ रहा हूँ मुझे बताए कि मुझे क्या करना है। भिक्षु ने राजा को कुछ जड़ी बूटियां दी। और कहा, यह इस व्यक्ति को पीसकर पीला दो और कुछ इसके शरीर पर लगा दो।

कुछ देर बाद दर्द से कराह रही उस व्यक्ति को दर्द से राहत मिल गई और उस व्यक्ति ने भिक्षु और राजा का धन्यवाद किया। उसके परिवार वालों ने भिक्षु और राजा से प्रार्थना की कि वह उनके यहाँ पर भोजन ग्रहण कर कर जाए। भोजन करने के बाद भिक्षु और राजा वहाँ से चले गए। रास्ते में कुछ बच्चे खेल रहे थे। भिक्षु ने अपनी झोली से कुछ भोजन निकालकर राजा के हाथ में दे दिया और कहा।

ऐसे बच्चों में बांट दो राजा ने वैसा ही किया। राजा बच्चों के साथ इतना मस्त हो गया कि वह भूल ही गया कि वह एक चक्रवर्ती सम्राट है। वह बहुत खुश था। राजा ने भिक्षु का धन्यवाद किया और कहा, आपकी वजह से मैं यह जान पाया कि अभी तक मैंने अपना जीवन बर्बाद ही किया है, लेकिन अब मैं बहुत लंबी लकीर खींचने वाला हूँ, लेकिन ये लकीर अब किसी को दिखाई नहीं देगी।

तब से राजा रोज़ बेस बदलकर व्यक्तिगत तौर पर लोगों की मदद करता और राजा के तौर पर अपनी प्रजा की देखभाल करता तो यह कहानी थी शायद आप समझ पाए हों कि आप पाप छिपा कर करते हैं ताकि किसी को पता ना चले लेकिन सबसे पहले आपको ही पता चल जाता है

Comments

Popular posts from this blog

जैसा सोचेंगे वैसा ही होगा | jaisa sochoge waisa hi hoga| hindi kahaniya | moral stories | hindi fairy tales

ध्यान बढ़ाने के 5 नियम | Extreme focus| hindi kahaniya | moral stories | Motivational Story

आपकी उदासी का कारण | aapki udaasi kakara| hindi kahaniya | moral stories | Motivational Story