तुम्हारे तनाव का असली कारण | tanav ka asli karan | hindi kahaniya | moral stories | hindi fairy tales
तुम्हारे तनाव का असली कारण | tanav ka asli karan | hindi kahaniya | moral stories | hindi fairy tales
दोस्तो आज की इस कहानी में आप सभी का स्वागत है | आज की इस कहानी का नाम है - तुम्हारे तनाव का असली कारण | अगर आपको hindi kahaniya, moral stories, hindi stories, hindi fairy tales पढ़ने का शौक है तो इस कहानी को पूरा जरूर पढ़े|
धूप और छांव की तरह हमारे जीवन में सुख और दुख आते रहते हैं। हमें लगता है कि हमारे जीवन में हजारों दुखे लेकिन अगर वास्तविकता में देखा जाए, आँखें खोलकर देखा जाए तो जीवन में सिर्फ एक ही दुख होता है। और वो दुख क्या है? इस बुद्ध कहानी के माध्यम से हम समझ जाएंगे कि वो एकमात्र दुख क्या है और उसका समाधान क्या है? तो अपने दुख का निवारण करने के लिए इस कहानी को आखिर तक जरूर सुनें।
एक कहानी है। एक व्यापारी का एक युवा पुत्र था। उस पुत्र ने अभी तक अपने जीवन में कोई दुख नहीं देखा था। उसके पास सभी तरह की संपदा थी। उसके बहुत मित्र थे, उसके चाहने वाले बहुत थे। धन दौलत की उसके पास कोई कमी नहीं थी। 1 दिन व्यापारी बहुत बीमार हो गया। वह अपने जीवन की अंतिम सांसें लेने लगा। जब उसे लगा कि वह अब नहीं बचेगा तो उसने अपने पुत्र को अपने पास बुलाया और उससे कहा।
पुत्र तुमने आज तक केवल सुख को ही बोगा है। तुम नहीं जानते कि दुख क्या होता है। मुझे डर है कि जब यह तुम्हारे पास आएगा तो तुम इसे नहीं सह सकोगे। इसलिए पुत्र मैं तुम्हें कहना चाहता हूँ कि सावधान रहना मेरी मृत्यु के बाद तुम्हारे अपने ही तुम्हारे दुख का कारण बन जाएंगे। यह कहकर वह व्यापारी मृत्यु को प्राप्त हो गया। वह युवा लड़का अपने पिता की मृत्यु से दुखी हो गया, लेकिन
उसके मित्रों ने उसे समझाया कि उसे अब खुश होना चाहिए क्योंकि सभी धन, दौलत और सभी संपत्ति अब उसकी हो गई है। वह अब उन चीजों का भी आनंद ले सकता है जिसका आनंद वहाँ उसके पिता के रहते नहीं ले पाया। वह वैशाली जा सकता है, वह हर तरह का नशा कर सकता है। दूर दूर दुनिया में घूम सकता है दिन रात कभी भी किसी को भी अपने घर बुला सकता है और किसी के भी घर जा सकता है। वह कुछ भी खरीद सकता है।
क्योंकि उसके पास बहुत दौलत है। अब सारा व्यापार भी उसी के हाथ में है। यह सब सुनकर वह लड़का बहुत खुश हुआ। उसे लगा कि पिता बेकार में ही उसे डराकर चले गए। अब तो और भी अधिक सुख के दिन आएँगे। अब वह उन सभी सुखों का आनंद लें गा जो उसे आज तक नहीं मिले थे। उस नगर में एक बहुत बड़ा मंदिर बन रहा था। नगर में घोषणा हुई कि जो भी सबसे अधिक दान उस मंदिर को बनाने के लिए देगा उसका नाम उस मंदिर के एक पत्थर पर स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। उस लड़के को उसके मित्रों ने इस बारे में बताया। तब उस लड़के ने एक बहुत बड़ा दान उस मंदिर को दिया और यह निश्चित हो गया कि उस लड़के का नाम उस मंदिर के पत्थर पर स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। उस मंदिर को दान देने के बाद जब वह वापस जा रहा था तो रास्ते में उसे एक भिखारी मिला। भिखारी ने उससे भोजन याचना की। उस लड़के ने कहा तुम जैसे लोग केवल दो वक्त की रोटी के लिए ही चिल्लाते रहते हो
पता नहीं भगवान तुम जैसे लोगों को पैदा ही क्यों करता है तुम लोग गंदगी हो, दुख हो तुम्हे तो जीने का हक भी नहीं होना चाहिए। केवल दो रोटी के लिए कहीं भी झुक जाते हो, झुकना ही है तो भगवान के सामने झुक को शायद वह तुम्हें कुछ दे दें। वह लड़का उस भिखारी को भला बुरा कहते हुए वहाँ से चला गया। अब उस लड़के के पास मित्रों, सहयोगियों और रिश्तेदारों की संख्या बढ़ गई थी। हर कोई उससे पूछता था, हर चीज़ में पूछता था।
उस लड़के का अहंकार सातवें आसमान पर था। सभी लोग उसके विश्वासपात्र बन गए थे। सभी ने उस लड़के से धन उधार लेना शुरू कर दिया था। उस लड़के ने भी अपने आप को साबित करने के लिए बढ़ चढ़ कर सभी को धन उधार दिया। उसने नशा शुरू कर दिया। वह वैशाली जाने लगा। उसका व्यापार धीरे धीरे ठप होने लगा और 1 दिन वह बहुत बड़े कर्जे में डूब गया और जब उसने अपने मित्रों, सहयोगियों और रिश्तेदारों से अपना धन वापस मांगा।
तो उन्होंने उसे वहाँ से भगा दिया। वह सभी के पास गया, लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की। उसका घर बार सब बिक गया था। उसके पास अब फूटी कौड़ी भी नहीं बची थी। अब वह रास्ते पर आ गया था। उसने कहा, अपने सुख के दिनों में मैं नहीं जान पाया कि मैं अपने शत्रुओं से घिरा हुआ था। मुझे यह दिखाने के लिए हे दुख तेरा धन्यवाद। सारे दिन वह इधर से उधर भटकता रहा और सोचता रहा की अब उसके जीवन का क्या होगा?
वह क्या खायेगा, कहा रहेगा, कहाँ सोयेगा? उसे अपने पिता की याद आ रही थी, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। उसे भूख लग रही थी। उसे वह मंदिर याद आया जहाँ उसने सबसे ज्यादा दान दिया था। वह भागकर उस मंदिर पर गया और पुजारी के पास पहुंचा। उसने पुजारी से कहा क्या आपने मुझे पहचाना? मैंने इस मंदिर को बहुत बड़ा दान दिया था। मेरा नाम इस मंदिर के पत्थर पर स्वर्ण अक्षरों में लिखा हुआ है।
मेरी हालात बहुत खराब है, मैं बहुत भूखा हूँ, क्या आप मुझे भोजन दे सकते है? पुजारी ने कहा, भिखारियों को बाहर भोजन दिया जाता है, आप बाहर बैठ जाएं और भिखारियों का नाम मंदिर के पत्थर पर स्वर्ण अक्षरों में नहीं लिखा जाता। पुजारियों ने आपस में मंत्रणा कर उस लड़के का नाम उस पत्थर से हटवा दिया और घोषणा की कि जो भी इस मंदिर को सबसे बड़ा दान देगा उसका नाम इस मंदिर के पत्थर पर स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।
यह सब देखकर उस लड़के ने कहा, जीवन बहुत छोटा है और बहुत दुखदायी है। यह मैंने अब जाना है। जब पत्थर पर लिखा नाम मिटाया जा सकता है तो यह जीवन भी कभी भी समाप्त हो सकता है। वह लड़का मंदिर के बाहर एक तरफ बैठ गया। लोग आते रहे और भिखारियों को कुछ ना कुछ देते रहे। लेकिन उस लड़के की हिम्मत कुछ भीख मांगने की नहीं हो रही थी और ना ही वह भिखारियों में बैठना चाहता था। रात हो गई। उसे बहुत भूख लग रही थी।
पहली बार उसने भूख को जाना। उसने सोचा मंदिर से कुछ भोजन चुरा लेता हूँ, लेकिन तभी उसके पास एक बिखारी आया। यह वही बिखारी था जो उस लड़के को पहले भी मिल चुका था। उसने उस लड़के को कुछ भोजन देते हुए कहा मित्र यह खा लो, मैं समझता हूँ तुम झुकना नहीं चाहते और अगर तुम नहीं झुकोगे तो तुम्हे भोजन नहीं मिलेगा। हम काम करना चाहते हैं मगर रोज़ काम नहीं मिलता लेकिन यह भूख रोज़ लगती है।
यह एक ऐसी बिमारी है जिसका कोई इलाज नहीं है। भूख से बड़ी कोई बिमारी इस दुनिया में नहीं है। लड़के ने कहा, अपने सुख के दिनों में मेरे पास मित्रों, सहयोगियों और रिश्तेदारों की भीड़ थी। सभी मेरे शुभचिंतक थे, लेकिन मेरे दुख में वह सब मेरे सत्रों हो गए। लेकिन तुम मेरे दुख में पहले सहयोगी हो, पहले मित्र हों, पहले रिश्तेदार हो जिसने मुझ पर दया की है। मैं
अपने आप को बहुत बड़ा समझता था, लेकिन अब समझ में आया कि धन से कोई बड़ा नहीं होता। मन बड़ा होना चाहिए। तुम मुझसे बहुत बड़े हो। उस लड़के ने वह भोजन किया और उसने पहली बार भोजन के सुख को जाना, उसके हाथ कांप रहे थे। मुँह जल्दी से भोजन को चबा लेना चाहता था। पेट भोजन को ग्रहण करना चाहता था और जब उसने भोजन किया तो वह तो हुआ। उसे सुख का अनुभव हुआ। उसने कहा, यह कैसा सुख हैं? मेरे दुख में भी सुख का अनुभव कैसे हो सकता है?
भिखारी ने कहा, मैंने अपने दुखों से जाना है कि जहाँ तृप्ति होती है वहाँ सुख का अनुभव होता है, लेकिन सावधान तृप्ति खतरनाक भी होती है। जब यह तृप्ति आवश्यकताओं से ऊपर उठ जाती है तब यह दुख के दर्शन भी करा सकती है। आज तुम्हें इस भोजन में सुख प्राप्त हुआ है। यही भोजन अगर तुम्हें रोज़ मिलता रहे तो तुम और अच्छे भोजन की कामना करोगे। यही कामना और इस कामना की तृप्ति तुम्हारे लिए दुख पैदा करेगी।
लेकिन जब इस स्वादिष्ट भोजन की तृप्ति पूरी होगी तो तुम सुख का आनंद लो गी लेकिन वह सुख आएगा और चला जाएगा और जब तुम्हारे जीवन में इसी तरह के स्वादिष्ट भोजन लगातार आते रहेंगे, तब तुम किसी और कामना की ओर अग्रसर हो जाओगे और उसके तृप्ति करना चाहोगे। तृप्ति नहीं होने पर दुख होगा होने पर सुख होगा, लेकिन तुम यही नहीं रखोगे। यह श्रंखला आगे लगातार चलती जाएगी।
तुम सुख के पीछे भागोगे, दुख तुम्हारे पीछे भागेगा, तुम सुख को पकड़ोगे, दुख तुम्हें पकड़ लेगा, ऐसा लगातार चलता रहेगा। भिखारी ने अपनी जेब से एक सोने की थैली निकालकर उस लड़के को दे दी। लड़के ने कहा तुम्हारे पास इतना धन कहाँ से आया? भिखारी ने कहा यह धन भी तुम्हारा ही है। 1 दिन जब तुम मुझे भला बुरा कह कर जा रहे थे, तब तुमने इसे रास्ते पर गिरा दिया था और मैंने यह उठाकर रख लिया था।
कि जब तुम वापस आओगे तो मैं तुम्हें दे दूंगा, लो और इसे रख लो। लड़के ने कहा मुझे इस धन के लिए सभी लोगों ने धोखा दिया, लेकिन तुम एकमात्र ऐसे हो जिसने मेरे इस बुरे समय में इस धन से मेरी सहायता की है। मैं इस धन से दोबारा व्यापारारम्भ करूँगा और तुम्हें अपना साझीदार बनाऊंगा। भिखारी ने कहा, कोई हमें दुख नहीं देता, हम स्वयं को खुद ही धोखा देते हैं, सुख हमें भ्रमित कर देता है।
और हम उसके मायाजाल में फंस जाते हैं। हम जानबूझकर देखना नहीं चाहते। हम नहीं जानना चाहते हैं कि जीवन छोटा भी होता है, लोग मरते भी है, गरीबी भी होती है, दुख भी आता है। हम बस अपने अहंकार को बढ़ावा देते चले जाते है। लड़के ने कहा तुम सही कहते हो? जब सुख था तुम्हें अंधा हो गया था। अब दुख है तो मेरी आंखें खुली है, लेकिन इस ज्ञान के साथ जो मैंने दुख में पाया है मैं हमेशा अपनी आंखें खुली रखूँगा।
मानव शरीर में बहुत ऊर्जा है, बहुत शक्ति है पर वो बेकार की चीजों में बढ़ कर रह गई है। व्यर्थ की चीजों में लगी रहती है दोस्तों अक्सर हम ऊपर वाले से सवाल करते हैं कि हमारे जीवन में इतने दुख क्यों है? हम सभी के मन में यह सवाल उठता है और इसका जवाब है कि वो परमात्मा हमें उस परम दुख तक ले जाना चाहता है। वो सबसे बड़े दुख तक ले जाना चाहता है, जहाँ पर हमें पता चल सके कि इंसानी आत्मा का असली दुख क्या है?
और वो दुख है अपने आप को ना पहचान पाना, अपनी शक्तिओं को ना पहचान पाना, अपने आप को इकट्ठा ना कर पाना, अपने आप पर नियंत्रण ना कर पाना। हमारे जीवन में यही दुख होता है लेकिन इस दुख को ना देखकर हम सभी प्रकार के दुख देखते हैं लेकिन इस दुख पर हमारा कभी ध्यान ही नहीं जाता और वास्तव में होना यह चाहिए कि जब हमारे जीवन में दुःख आते हैं तो हमारी सोच वहाँ पर होनी चाहिए कि मैं क्यों हूँ?
मैं क्या हूँ और जब ये एकमात्र दुख आपके जीवन में आपको नजर आता है तब आप ध्यान की तरफ बढ़ते हैं तब आप अपने आप को खोजने की तरफ चलते हैं
धूप और छांव की तरह हमारे जीवन में सुख और दुख आते रहते हैं। हमें लगता है कि हमारे जीवन में हजारों दुखे लेकिन अगर वास्तविकता में देखा जाए, आँखें खोलकर देखा जाए तो जीवन में सिर्फ एक ही दुख होता है। और वो दुख क्या है? इस बुद्ध कहानी के माध्यम से हम समझ जाएंगे कि वो एकमात्र दुख क्या है और उसका समाधान क्या है? तो अपने दुख का निवारण करने के लिए इस कहानी को आखिर तक जरूर सुनें।
एक कहानी है। एक व्यापारी का एक युवा पुत्र था। उस पुत्र ने अभी तक अपने जीवन में कोई दुख नहीं देखा था। उसके पास सभी तरह की संपदा थी। उसके बहुत मित्र थे, उसके चाहने वाले बहुत थे। धन दौलत की उसके पास कोई कमी नहीं थी। 1 दिन व्यापारी बहुत बीमार हो गया। वह अपने जीवन की अंतिम सांसें लेने लगा। जब उसे लगा कि वह अब नहीं बचेगा तो उसने अपने पुत्र को अपने पास बुलाया और उससे कहा।
पुत्र तुमने आज तक केवल सुख को ही बोगा है। तुम नहीं जानते कि दुख क्या होता है। मुझे डर है कि जब यह तुम्हारे पास आएगा तो तुम इसे नहीं सह सकोगे। इसलिए पुत्र मैं तुम्हें कहना चाहता हूँ कि सावधान रहना मेरी मृत्यु के बाद तुम्हारे अपने ही तुम्हारे दुख का कारण बन जाएंगे। यह कहकर वह व्यापारी मृत्यु को प्राप्त हो गया। वह युवा लड़का अपने पिता की मृत्यु से दुखी हो गया, लेकिन
उसके मित्रों ने उसे समझाया कि उसे अब खुश होना चाहिए क्योंकि सभी धन, दौलत और सभी संपत्ति अब उसकी हो गई है। वह अब उन चीजों का भी आनंद ले सकता है जिसका आनंद वहाँ उसके पिता के रहते नहीं ले पाया। वह वैशाली जा सकता है, वह हर तरह का नशा कर सकता है। दूर दूर दुनिया में घूम सकता है दिन रात कभी भी किसी को भी अपने घर बुला सकता है और किसी के भी घर जा सकता है। वह कुछ भी खरीद सकता है।
क्योंकि उसके पास बहुत दौलत है। अब सारा व्यापार भी उसी के हाथ में है। यह सब सुनकर वह लड़का बहुत खुश हुआ। उसे लगा कि पिता बेकार में ही उसे डराकर चले गए। अब तो और भी अधिक सुख के दिन आएँगे। अब वह उन सभी सुखों का आनंद लें गा जो उसे आज तक नहीं मिले थे। उस नगर में एक बहुत बड़ा मंदिर बन रहा था। नगर में घोषणा हुई कि जो भी सबसे अधिक दान उस मंदिर को बनाने के लिए देगा उसका नाम उस मंदिर के एक पत्थर पर स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। उस लड़के को उसके मित्रों ने इस बारे में बताया। तब उस लड़के ने एक बहुत बड़ा दान उस मंदिर को दिया और यह निश्चित हो गया कि उस लड़के का नाम उस मंदिर के पत्थर पर स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। उस मंदिर को दान देने के बाद जब वह वापस जा रहा था तो रास्ते में उसे एक भिखारी मिला। भिखारी ने उससे भोजन याचना की। उस लड़के ने कहा तुम जैसे लोग केवल दो वक्त की रोटी के लिए ही चिल्लाते रहते हो
पता नहीं भगवान तुम जैसे लोगों को पैदा ही क्यों करता है तुम लोग गंदगी हो, दुख हो तुम्हे तो जीने का हक भी नहीं होना चाहिए। केवल दो रोटी के लिए कहीं भी झुक जाते हो, झुकना ही है तो भगवान के सामने झुक को शायद वह तुम्हें कुछ दे दें। वह लड़का उस भिखारी को भला बुरा कहते हुए वहाँ से चला गया। अब उस लड़के के पास मित्रों, सहयोगियों और रिश्तेदारों की संख्या बढ़ गई थी। हर कोई उससे पूछता था, हर चीज़ में पूछता था।
उस लड़के का अहंकार सातवें आसमान पर था। सभी लोग उसके विश्वासपात्र बन गए थे। सभी ने उस लड़के से धन उधार लेना शुरू कर दिया था। उस लड़के ने भी अपने आप को साबित करने के लिए बढ़ चढ़ कर सभी को धन उधार दिया। उसने नशा शुरू कर दिया। वह वैशाली जाने लगा। उसका व्यापार धीरे धीरे ठप होने लगा और 1 दिन वह बहुत बड़े कर्जे में डूब गया और जब उसने अपने मित्रों, सहयोगियों और रिश्तेदारों से अपना धन वापस मांगा।
तो उन्होंने उसे वहाँ से भगा दिया। वह सभी के पास गया, लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की। उसका घर बार सब बिक गया था। उसके पास अब फूटी कौड़ी भी नहीं बची थी। अब वह रास्ते पर आ गया था। उसने कहा, अपने सुख के दिनों में मैं नहीं जान पाया कि मैं अपने शत्रुओं से घिरा हुआ था। मुझे यह दिखाने के लिए हे दुख तेरा धन्यवाद। सारे दिन वह इधर से उधर भटकता रहा और सोचता रहा की अब उसके जीवन का क्या होगा?
वह क्या खायेगा, कहा रहेगा, कहाँ सोयेगा? उसे अपने पिता की याद आ रही थी, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। उसे भूख लग रही थी। उसे वह मंदिर याद आया जहाँ उसने सबसे ज्यादा दान दिया था। वह भागकर उस मंदिर पर गया और पुजारी के पास पहुंचा। उसने पुजारी से कहा क्या आपने मुझे पहचाना? मैंने इस मंदिर को बहुत बड़ा दान दिया था। मेरा नाम इस मंदिर के पत्थर पर स्वर्ण अक्षरों में लिखा हुआ है।
मेरी हालात बहुत खराब है, मैं बहुत भूखा हूँ, क्या आप मुझे भोजन दे सकते है? पुजारी ने कहा, भिखारियों को बाहर भोजन दिया जाता है, आप बाहर बैठ जाएं और भिखारियों का नाम मंदिर के पत्थर पर स्वर्ण अक्षरों में नहीं लिखा जाता। पुजारियों ने आपस में मंत्रणा कर उस लड़के का नाम उस पत्थर से हटवा दिया और घोषणा की कि जो भी इस मंदिर को सबसे बड़ा दान देगा उसका नाम इस मंदिर के पत्थर पर स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।
यह सब देखकर उस लड़के ने कहा, जीवन बहुत छोटा है और बहुत दुखदायी है। यह मैंने अब जाना है। जब पत्थर पर लिखा नाम मिटाया जा सकता है तो यह जीवन भी कभी भी समाप्त हो सकता है। वह लड़का मंदिर के बाहर एक तरफ बैठ गया। लोग आते रहे और भिखारियों को कुछ ना कुछ देते रहे। लेकिन उस लड़के की हिम्मत कुछ भीख मांगने की नहीं हो रही थी और ना ही वह भिखारियों में बैठना चाहता था। रात हो गई। उसे बहुत भूख लग रही थी।
पहली बार उसने भूख को जाना। उसने सोचा मंदिर से कुछ भोजन चुरा लेता हूँ, लेकिन तभी उसके पास एक बिखारी आया। यह वही बिखारी था जो उस लड़के को पहले भी मिल चुका था। उसने उस लड़के को कुछ भोजन देते हुए कहा मित्र यह खा लो, मैं समझता हूँ तुम झुकना नहीं चाहते और अगर तुम नहीं झुकोगे तो तुम्हे भोजन नहीं मिलेगा। हम काम करना चाहते हैं मगर रोज़ काम नहीं मिलता लेकिन यह भूख रोज़ लगती है।
यह एक ऐसी बिमारी है जिसका कोई इलाज नहीं है। भूख से बड़ी कोई बिमारी इस दुनिया में नहीं है। लड़के ने कहा, अपने सुख के दिनों में मेरे पास मित्रों, सहयोगियों और रिश्तेदारों की भीड़ थी। सभी मेरे शुभचिंतक थे, लेकिन मेरे दुख में वह सब मेरे सत्रों हो गए। लेकिन तुम मेरे दुख में पहले सहयोगी हो, पहले मित्र हों, पहले रिश्तेदार हो जिसने मुझ पर दया की है। मैं
अपने आप को बहुत बड़ा समझता था, लेकिन अब समझ में आया कि धन से कोई बड़ा नहीं होता। मन बड़ा होना चाहिए। तुम मुझसे बहुत बड़े हो। उस लड़के ने वह भोजन किया और उसने पहली बार भोजन के सुख को जाना, उसके हाथ कांप रहे थे। मुँह जल्दी से भोजन को चबा लेना चाहता था। पेट भोजन को ग्रहण करना चाहता था और जब उसने भोजन किया तो वह तो हुआ। उसे सुख का अनुभव हुआ। उसने कहा, यह कैसा सुख हैं? मेरे दुख में भी सुख का अनुभव कैसे हो सकता है?
भिखारी ने कहा, मैंने अपने दुखों से जाना है कि जहाँ तृप्ति होती है वहाँ सुख का अनुभव होता है, लेकिन सावधान तृप्ति खतरनाक भी होती है। जब यह तृप्ति आवश्यकताओं से ऊपर उठ जाती है तब यह दुख के दर्शन भी करा सकती है। आज तुम्हें इस भोजन में सुख प्राप्त हुआ है। यही भोजन अगर तुम्हें रोज़ मिलता रहे तो तुम और अच्छे भोजन की कामना करोगे। यही कामना और इस कामना की तृप्ति तुम्हारे लिए दुख पैदा करेगी।
लेकिन जब इस स्वादिष्ट भोजन की तृप्ति पूरी होगी तो तुम सुख का आनंद लो गी लेकिन वह सुख आएगा और चला जाएगा और जब तुम्हारे जीवन में इसी तरह के स्वादिष्ट भोजन लगातार आते रहेंगे, तब तुम किसी और कामना की ओर अग्रसर हो जाओगे और उसके तृप्ति करना चाहोगे। तृप्ति नहीं होने पर दुख होगा होने पर सुख होगा, लेकिन तुम यही नहीं रखोगे। यह श्रंखला आगे लगातार चलती जाएगी।
तुम सुख के पीछे भागोगे, दुख तुम्हारे पीछे भागेगा, तुम सुख को पकड़ोगे, दुख तुम्हें पकड़ लेगा, ऐसा लगातार चलता रहेगा। भिखारी ने अपनी जेब से एक सोने की थैली निकालकर उस लड़के को दे दी। लड़के ने कहा तुम्हारे पास इतना धन कहाँ से आया? भिखारी ने कहा यह धन भी तुम्हारा ही है। 1 दिन जब तुम मुझे भला बुरा कह कर जा रहे थे, तब तुमने इसे रास्ते पर गिरा दिया था और मैंने यह उठाकर रख लिया था।
कि जब तुम वापस आओगे तो मैं तुम्हें दे दूंगा, लो और इसे रख लो। लड़के ने कहा मुझे इस धन के लिए सभी लोगों ने धोखा दिया, लेकिन तुम एकमात्र ऐसे हो जिसने मेरे इस बुरे समय में इस धन से मेरी सहायता की है। मैं इस धन से दोबारा व्यापारारम्भ करूँगा और तुम्हें अपना साझीदार बनाऊंगा। भिखारी ने कहा, कोई हमें दुख नहीं देता, हम स्वयं को खुद ही धोखा देते हैं, सुख हमें भ्रमित कर देता है।
और हम उसके मायाजाल में फंस जाते हैं। हम जानबूझकर देखना नहीं चाहते। हम नहीं जानना चाहते हैं कि जीवन छोटा भी होता है, लोग मरते भी है, गरीबी भी होती है, दुख भी आता है। हम बस अपने अहंकार को बढ़ावा देते चले जाते है। लड़के ने कहा तुम सही कहते हो? जब सुख था तुम्हें अंधा हो गया था। अब दुख है तो मेरी आंखें खुली है, लेकिन इस ज्ञान के साथ जो मैंने दुख में पाया है मैं हमेशा अपनी आंखें खुली रखूँगा।
मानव शरीर में बहुत ऊर्जा है, बहुत शक्ति है पर वो बेकार की चीजों में बढ़ कर रह गई है। व्यर्थ की चीजों में लगी रहती है दोस्तों अक्सर हम ऊपर वाले से सवाल करते हैं कि हमारे जीवन में इतने दुख क्यों है? हम सभी के मन में यह सवाल उठता है और इसका जवाब है कि वो परमात्मा हमें उस परम दुख तक ले जाना चाहता है। वो सबसे बड़े दुख तक ले जाना चाहता है, जहाँ पर हमें पता चल सके कि इंसानी आत्मा का असली दुख क्या है?
और वो दुख है अपने आप को ना पहचान पाना, अपनी शक्तिओं को ना पहचान पाना, अपने आप को इकट्ठा ना कर पाना, अपने आप पर नियंत्रण ना कर पाना। हमारे जीवन में यही दुख होता है लेकिन इस दुख को ना देखकर हम सभी प्रकार के दुख देखते हैं लेकिन इस दुख पर हमारा कभी ध्यान ही नहीं जाता और वास्तव में होना यह चाहिए कि जब हमारे जीवन में दुःख आते हैं तो हमारी सोच वहाँ पर होनी चाहिए कि मैं क्यों हूँ?
मैं क्या हूँ और जब ये एकमात्र दुख आपके जीवन में आपको नजर आता है तब आप ध्यान की तरफ बढ़ते हैं तब आप अपने आप को खोजने की तरफ चलते हैं

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